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बेंगलुरु के लोग 'फ्रीडम पार्क से आज़ादी' क्यों मांग रहे हैं?

✍️ Admin 📅 30 October, 2026 ⏰ 02:51 PM 👁 20 views

इसमें कोई शक नहीं कि यह अलग-अलग सुविधाओं के लिए अलग-अलग तरह की 'जगहों' की बढ़ती मांग का दौर है. अब जगह की ज़रूरत सिर्फ़ रहने, काम करने और खेलने के लिए नहीं है. इस सूची में एक और मांग जुड़ गई है, विरोध प्रदर्शन करने की जगह. दिल्ली का जंतर-मंतर रहा हो, मुंबई का आज़ाद मैदान या देश के किसी दूसरे हिस्से में प्रदर्शन के लिए तय कोई जगह, लोगों को इसकी ज़रूरत कई वजहों से पड़ती है. देश की राजधानी या किसी राज्य में जब महिलाओं के साथ अपराध की घटनाएं सामने आती हैं, तो लोग अपना ग़ुस्सा और नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए सड़कों पर उतरते हैं. किसी जाति को आरक्षण देने या उससे वंचित रखने का मामला हो, तब भी विरोध प्रदर्शन होते हैं. इसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में आदिवासियों या दूसरे वंचित तबक़ों को उनके अधिकार न मिलने पर भी लोग अपनी आवाज़ उठाने के लिए किसी सार्वजनिक जगह पर जमा होते हैं. ऐसे में बेंगलुरु में 'फ्रीडम पार्क से आज़ादी' नाम से शुरू हुआ एक अभियान सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींच रहा है. देश की टेक्नोलॉजी राजधानी बेंगलुरु में नागरिक संगठनों, ट्रेड यूनियनों और छात्र संगठनों की मांग थोड़ी अलग है. उन्होंने 'फ्रीडम फ्रॉम फ्रीडम पार्क' यानी 'फ्रीडम पार्क से आज़ादी' नाम से एक अभियान शुरू किया है. उनकी मांग है कि लोगों को केवल फ्रीडम पार्क ही नहीं, बल्कि शहर की दूसरी जगहों पर भी विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार मिले. फ्रीडम पार्क लगभग 15 एकड़ में फैला है. इसमें से पांच एकड़ जगह कर्नाटक की राजधानी में विरोध प्रदर्शन करने वाले लोगों के लिए तय की गई है. यह अभियान ऐसे समय शुरू हुआ है, जब पुलिस ने पिछले कुछ हफ़्तों में बेंगलुरु के टाउन हॉल पर किसी भी विरोध प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया. शहर के सबसे व्यस्त चौराहों में से एक पर बना टाउन हॉल पहले बेंगलुरु में विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत की प्रमुख जगह हुआ करता था. टाउन हॉल पर आख़िरी बड़ा प्रदर्शन नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए के ख़िलाफ़ हुआ था. उस प्रदर्शन के दौरान गिरफ़्तार किए गए लोगों में जाने-माने इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता रामचंद्र गुहा भी शामिल थे. गुहा टाउन हॉल की सीढ़ियों पर चुपचाप खड़े थे. उनके हाथ में सीएए के विरोध वाला एक पोस्टर था. वह सड़क के दूसरी तरफ़ प्रदर्शन कर रहे समाज के अलग-अलग वर्गों के लोगों को देख रहे थे. रामचंद्र गुहा को हिरासत में लिए जाने की ख़बर दुनिया भर में पहुंच गई. इसके बाद महात्मा गांधी पर किताबों की शृंखला लिखने वाले गुहा को हिरासत में लेने वाले सब-इंस्पेक्टर को तुरंत वहां से हटा दिया गया. तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को शायद यह एहसास हो गया था कि इतिहासकार को हिरासत में लिए जाने का असर दुनिया भर में हो रहा है. नज़दीकी पुलिस थाने पहुंचने के कुछ ही समय बाद गुहा को रिहा कर दिया गया. इसके बाद पुलिस उन्हें सम्मान के साथ उनके घर तक छोड़कर आई. गुहा की गिरफ़्तारी के बाद पुलिस ने सड़क के बीच प्रदर्शन कर रहे लोगों को हटाने के लिए 'बल प्रयोग' नहीं किया. इसके बजाय पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से अनुरोध किया कि वे सड़क से हट जाएं, ताकि दूसरे लोग ट्रैफ़िक जाम में न फंसें. इसके बाद टाउन हॉल सीएए विरोधी प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र बन गया. लेकिन पिछले शुक्रवार को जब लोग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ पोस्टर लेकर टाउन हॉल पर जमा हुए, तो एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने माइक्रोफ़ोन संभाला और उनसे अपील की. अधिकारी ने कहा, "प्रदर्शन के आयोजकों ने लिखकर दिया है कि यहां से फ्रीडम पार्क तक केवल तिरंगा मार्च निकाला जाएगा." "आप नारे नहीं लगा सकते और किसी की आलोचना करने वाले पोस्टर नहीं दिखा सकते. आप फ्रीडम पार्क में विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं." "कृपया यहां विरोध प्रदर्शन न करें. ऐसा करना अदालत की अवमानना माना जाएगा." कुछ युवाओं ने इसका विरोध किया और पुलिस अधिकारी से सवाल पूछे. आख़िरकार आयोजकों ने लोगों से नियम न तोड़ने की अपील की. इसके बाद लोग बिना नारे लगाए, चुपचाप राष्ट्रीय ध्वज लेकर फ्रीडम पार्क की ओर बढ़ गए. अगस्त 2022 से फ्रीडम पार्क ही शहर में होने वाले सभी विरोध प्रदर्शनों की आख़िरी मंज़िल बना हुआ है. टाउन हॉल से फ्रीडम पार्क तक निकाला गया यह दूसरा तिरंगा मार्च था. दोनों जगहों के बीच की दूरी 2.7 किलोमीटर है. यह मार्च शाम के उस समय निकला, जब शहर की सड़कों पर सबसे अधिक ट्रैफ़िक होता है. शहर की मुख्य सड़क से गुज़रते इस शांत जुलूस ने बेंगलुरु के कई पुराने लोगों को बीते समय की याद दिला दी. एक समय ऐसा भी था, जब पांच बड़ी सरकारी कंपनियों के लगभग 70 हज़ार कर्मचारियों में से क़रीब 35 हज़ार कर्मचारी सड़कों पर उतरे थे. ये कर्मचारी एचएएल, एचएमटी, बीईएल, बीएचईएल और आईटीआई में काम करते थे. वे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल से महात्मा गांधी रोड होते हुए विधान सौधा (विधानसभा भवन) तक पैदल गए थे. विधान सौधा कर्नाटक की सत्ता का प्रमुख केंद्र है. ये कर्मचारी कई वर्षों से वेतन में संशोधन की मांग कर रहे थे. यह घटना 1980 की है. साल 1974 की चर्चित रेलवे हड़ताल के बाद यह केंद्र सरकार और मजदूर वर्ग के बीच दूसरा सबसे बड़ा टकराव था. रेलवे हड़ताल के बाद आख़िरकार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया था. इसके बाद भी बेंगलुरु के अलग-अलग हिस्सों में कई बड़े विरोध प्रदर्शन हुए. समय के साथ बेंगलुरु का तेज़ी से विस्तार हुआ और सड़कों पर वाहनों की संख्या लगातार बढ़ती गई. डॉ. मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों के बाद यह बढ़ोतरी ख़ास तौर पर तेज़ हुई. इसके साथ ही शहर में विरोध प्रदर्शनों को समस्या के रूप में देखा जाने लगा. जब भी किसी हिस्से में विरोध प्रदर्शन होता, वहां ट्रैफ़िक पूरी तरह थम जाता था. मार्च 2021 में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और राज्य सार्वजनिक परिवहन निगम के कर्मचारियों ने विरोध प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन के बाद एक जज ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को चिट्ठी लिखी. बाद में ये दोनों जज सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. जज की यह चिट्ठी अपने आप जनहित याचिका बन गई. इस मामले का नंबर 5781/2021 था. यह मामला तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे और जस्टिस विश्वजीत शेट्टी की पीठ के सामने आया. पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जुलूस और विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए एक उचित व्यवस्था बनाई जाए, ताकि आम लोगों को परेशानी न हो. इसके बाद बेंगलुरु के पुलिस आयुक्त ने 'लाइसेंसिंग एंड रेगुलेशन ऑफ़ प्रोटेस्ट्स, डेमॉन्स्ट्रेशंस एंड प्रोटेस्ट मार्चेज़ (बेंगलुरु सिटी), 2021' नाम से एक आदेश जारी किया. तब से शहर में जुलूस और विरोध प्रदर्शनों को फ्रीडम पार्क तक सीमित कर दिया गया. यह विडंबना ही है कि फ्रीडम पार्क उसी जगह बनाया गया है, जहां कभी बेंगलुरु सेंट्रल जेल हुआ करती थी. बाद में इस जेल को शहर के बाहरी हिस्से में इलेक्ट्रॉनिक सिटी के पास ले जाया गया था. अगस्त 2022 में जस्टिस अराधे की पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि लाइसेंसिंग आदेश का पालन किया जाना चाहिए. इसके बाद बेंगलुरु के पुलिस आयुक्त ने 'लाइसेंसिंग एंड रेगुलेशन ऑफ़ प्रोटेस्ट्स, डेमॉन्स्ट्रेशंस एंड प्रोटेस्ट मार्चेज़ (बेंगलुरु सिटी), 2021' नाम से एक आदेश जारी किया. तब से शहर में जुलूस और विरोध प्रदर्शनों को फ्रीडम पार्क तक सीमित कर दिया गया. यह विडंबना ही है कि फ्रीडम पार्क उसी जगह बनाया गया है, जहां कभी बेंगलुरु सेंट्रल जेल हुआ करती थी. बाद में इस जेल को शहर के बाहरी हिस्से में इलेक्ट्रॉनिक सिटी के पास ले जाया गया था. अगस्त 2022 में जस्टिस अराधे की पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि लाइसेंसिंग आदेश का पालन किया जाना चाहिए. वकील मैत्री कृष्णन ने गांधी भवन में नागरिक संगठनों, ट्रेड यूनियनों और विद्यार्थियों की बैठक में कहा, "यह कहना पूरी तरह ग़लत है कि फ्रीडम पार्क के अलावा किसी दूसरी जगह प्रदर्शन करना हाई कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है." वकील विनय श्रीनिवास ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "लाइसेंसिंग आदेश में एक प्रावधान है, जिसके मुताबिक़ पुलिस आयुक्त लोगों को प्रदर्शन करने के लिए कोई दूसरी जगह भी तय कर सकते हैं." रामचंद्र गुहा भी इस बैठक में शामिल हुए. उन्होंने कहा, "जब से फ्रीडम पार्क को विरोध प्रदर्शन की इकलौती जगह बनाया गया है, मैं इसे ऐसी जगह कहता रहा हूं, जहां आज़ादी को बंद कर दिया गया है." "इसीलिए यहां इस्तेमाल किए जा रहे नारे, 'फ्रीडम फ्रॉम फ्रीडम पार्क' से मैं बहुत ख़ुश हूं." गुहा ने कहा, "अगर आप दुनिया के लोकतांत्रिक देशों को देखें, तो वहां हमेशा विरोध प्रदर्शन के लिए ऐसी जगह होती है, जहां दूसरे लोग भी देख सकें कि उनके साथी नागरिक क्या सोच रहे हैं." "इसलिए जो भी देश अपने यहां लोकतंत्र का थोड़ा-सा भी अस्तित्व होने का दावा करता है, उसे विरोध प्रदर्शन के लिए जगह देनी चाहिए." कई वर्षों तक विधान सौधा के ठीक सामने तिरछी दिशा में एक जगह हुआ करती थी, जिसे 'धरना कॉर्नर' कहा जाने लगा था. जिस व्यक्ति को कोई शिकायत होती, वह वहां बैठकर विरोध प्रदर्शन कर सकता था. ठीक उसी तरह, जैसे केरल में राज्य सचिवालय के सामने प्रदर्शन होते हैं. गांधी भवन की बैठक में एक ट्रेड यूनियन नेता ने कहा कि किसी भी विरोध प्रदर्शन का "सरकार की आंखों और कानों तक पहुंचना" ज़रूरी है. रामचंद्र गुहा ने राज्य के दूसरे हिस्सों में हो रहे विरोध प्रदर्शनों का ख़ास तौर पर ज़िक्र किया. गन्ना किसानों ने अपनी उपज की अधिक क़ीमत की मांग को लेकर बेलगावी और हुबली में बेंगलुरु-पुणे राजमार्ग रोक दिया है. गुहा ने कहा कि बैठक के प्रतिनिधि जब अपनी मांग लेकर राज्य के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे से मिले, तो उनसे एक बात साफ़ तौर पर कही जानी चाहिए. उन्होंने कहा, "ऐसी स्थिति नहीं हो सकती कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार इसी मुद्दे पर राहुल गांधी के साथ दिल्ली में विरोध प्रदर्शन कर सकें, लेकिन बेंगलुरु में विरोध प्रदर्शन की अनुमति न दें." बैठक में फ़ैसला किया गया कि सरकार पर दबाव बनाया जाएगा कि वह पुलिस आयुक्त को यह आदेश वापस लेने का निर्देश दे. अगर आदेश वापस नहीं लिया गया, तो शहर के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाई जाएगी. क़ानून के एक सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "वे अभी इस मामले को अदालत में नहीं ले जाना चाहते." "उन्हें यक़ीन नहीं है कि अदालत इस मामले पर कैसी प्रतिक्रिया देगी." इस बारे में सिविल सोसाइटी ग्रुप्स के प्रतिनिधियों ने राज्य के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे से मुलाकात की. इस बैठक के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में प्रियांक खड़गे ने कहा, "हम इस मुद्दे पर विचार कर रहे हैं. सिविल सोसाइटी ग्रुप्स के प्रतिनिधि मुझसे यह अपील करने आए थे कि बेंगलुरु में दूसरे स्थलों पर भी विरोध-प्रदर्शनों की अनुमति दी जानी चाहिए." उन्होंने कहा, "सरकार नागरिकों के अधिकारों को सीमित करने में दिलचस्पी नहीं रखती है. साथ ही, हम यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि जो लोग विरोध-प्रदर्शनों में शामिल नहीं हैं, उनके अधिकारों का भी ध्यान रखा जाए. इस मुद्दे पर हम जल्द ही निर्णय लेंगे." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

स्रोत: BBC Hindi

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