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'भारत अपने अल्पसंख्यकों का ध्यान रखे': बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन ने बीबीसी से और क्या कहा

✍️ Admin 📅 20 January, 2026 ⏰ 08:06 PM 👁 53 views

''हम भारत में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ कार्रवाइयों पर बयान नहीं देते. और मैं उम्मीद करता हूँ कि भारतीय अधिकारी भी यही नीति अपनाएँ." "ये हमारे नागरिक हैं. अगर उन पर ज़ुल्‍म-ज़्यादती हो रही है, तो हमारे पास उससे निपटने के तंत्र मौजूद हैं. भारत अपने अल्पसंख्यकों का ध्यान रखे. जैसे हम अपने अल्पसंख्यकों का रखते हैं." यह राय बांग्‍लादेश की अंतर‍िम सरकार में व‍िदेशी मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन की है. बांग्लादेश में अगले महीने 12 फ़रवरी को संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं. यह चुनाव ऐसे वक़्त पर हो रहा है जब बांग्लादेश और भारत के र‍िश्‍तों में तनाव देखा जा रहा है. बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें ढाका में हमने तौहीद हुसैन से दोनों देशों के बीच के मौजूदा र‍िश्‍तों, अल्‍पसंख्‍यकों के हालात, बांग्‍लादेश की राजनीत‍ि में जमात-ए-इस्‍लामी की भूमि‍का जैसे मुद्दों पर ख़ास बातचीत की. इमेज स्रोत, AFP via Getty Images हमने तौहीद हुसैन से पूछा क‍ि वह भारत और बांग्लादेश के मौजूदा रिश्ते को कैसे देखते हैं, क्‍या आपसी रिश्ते आज बेहद ख़राब हैं? तौहीद हुसैन का जवाब था, "मैं इस पर टिप्पणी नहीं करूँगा कि ये रिश्ते अपने सबसे निचले स्तर पर हैं या नहीं. मुझे लगता है कि बांग्लादेश और भारत के रिश्ते दोनों देशों के लिए अहम हैं. दोनों देशों को रिश्तों को मज़बूत रखने के लिए सकारात्मक क़दम उठाने चाहिए.'' हालाँक‍ि उन्‍होंने कहा क‍ि वो इस बात से सहमत हैं कि इस सरकार के कार्यकाल में बांग्लादेश-भारत के बीच रिश्ते उस तरह नहीं रहे, जैसे होने चाह‍िए थे. वह कहते हैं, ''हमें एक-दूसरे से ज़्यादा मेलजोल-बातचीत करनी चाहिए थी. ज़्यादा समझ बनानी चाहिए थी. और मैं चाहता हूँ कि आगे ऐसा हो." वह कहते हैं, "पिछले 17 महीनों से मैं इस ज़िम्मेदारी में हूँ. मैंने हमेशा बेहतर रिश्ते की कोशिश की है.'' उनके मुताब‍िक़, ''बांग्लादेश में एक आम भावना है और मैं भी कुछ हद तक उससे सहमत हूँ कि भारत की तरफ़ से प्रतिक्रिया बहुत सकारात्मक नहीं रही हैं.'' वह इस स‍िलस‍िले में पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना का ज़‍िक्र करते हैं. तौहीद हुसैन कहते हैं, ''बांग्लादेश की जो संवेदनशीलताएँ हैं, भारत ने पर्याप्त रूप से उनका ध्यान नहीं रखा. शेख़ हसीना भारत गई हैं. उन्हें वहाँ शरण दी गई है." "हमारी उम्मीद थी कि जब तक वे वहाँ हैं, वे ऐसे बयान देने से बचेंगी जो बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति से मेल नहीं खाते और जो दोनों देशों के रिश्तों के लिए भी अच्छा संकेत नहीं हैं." इमेज स्रोत, Devashish Kumar/BBC बांग्लादेश में हाल के दिनों में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा की कई घटनाएँ सामने आई हैं. भारत सरकार ने भी इस पर च‍िंता ज़ाह‍िर की है. भारत के अलग-अलग ह‍िस्‍सों में इसके ख़‍िलाफ़ व‍िरोध प्रदर्शन भी हुए हैं. हमने व‍िदेश मामलों के सलाहकार से जानना चाहा क‍ि यह धारणा बनी है क‍ि उनकी सरकार ने अल्‍पसंख्‍यकों पर हमले रोकने के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठाए हैं. तौहीद हुसैन का जवाब था, "ये इस बात पर निर्भर करता है कि कौन तय करेगा कि हमने इसे रोकने के ल‍िए पर्याप्त क़दम उठाए हैं या नहीं.'' ''कुछ घटनाएँ हुई हैं. इसमें कोई शक नहीं है. अगर हम गहराई से देखें कि सरकार ने क्या किया, तो हर मामले में तुरंत कार्रवाई हुई है. दोषियों के ख़िलाफ़ क़दम उठाए गए हैं. गिरफ़्तारियाँ हुई हैं. उन्हें न्याय प्रक्रिया का सामना करना पड़ रहा है. न्यायिक प्रक्रिया एक दिन या एक महीने में पूरी नहीं होती. इसमें वक़्त लगता है.'' भारत की प्रत‍िक्र‍िया के बारे में उनका कहना है, ''भारत ने इस मामले पर जो आधिकारिक चिंता जताई हैं, मैं उसका बिल्कुल स्वागत नहीं करता. ये पूरी तरह से बांग्लादेश का अंदरूनी मामला है." "हम भारत में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ होने वाली कार्रवाइयों पर बयान नहीं देते. मैं उम्मीद करता हूँ कि भारतीय अधिकारी भी वही नीति अपनाएँ." मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. भारत के कुछ ह‍िस्‍सों में बांग्‍लादेश में जमात-ए-इस्‍लामी के राजनीत‍िक असर पर चर्चा हो रही है. एक नज़र‍िया है क‍ि उनके विचार कट्टर हैं, अगर उनका असर बढ़ा तो बांग्‍लादेश उदार नहीं रह पाएगा. इसका असर अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर भी पड़ेगा. हमने तौहीद हुसैन से जानना चाहा क‍ि वह इसे कैसे देखते हैं. तौहीद हुसैन का कहना है, "जमात बांग्लादेश में लंबे समय से एक खुली राजनीतिक पार्टी रही है. उनके समर्थन का आधार है.'' वह जमात की बीजेपी से तुलना करते हुए कहते हैं, ''बीजेपी को कभी संसद में सिर्फ़ दो सीटें मिली थीं. मैं उस वक़्त भारत में था. वही बीजेपी एक अरसे बाद सबसे बड़ी पार्टी बनी. वही पार्टी दोबारा बहुमत की सरकार के साथ वापस आई.'' तौहीद का कहना है, ''अगर यह मुमक‍िन है तो हमें इसे मानने में कोई दिक़्क़त नहीं कि जमात-ए-इस्लामी की मौजूदगी बढ़ सकती है. वे राजनीति में हैं और राजनीति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं.'' ''हो सकता है कि आपको या मुझे, उनके विचार पसंद न आते हों लेकिन वे एक राजनीतिक पार्टी हैं और उनकी अपनी विचारधारा है." हमने तौहीद हुसैन का ध्‍यान स्त्र‍ियों के बारे में जमात के कुछ नेताओं के व‍िचार की तरफ़ द‍िलाया. मैंने बताया क‍ि हम जमात के कुछ नेताओं से म‍िले हैं. उनका मानना है क‍ि स्त्रियों को हमेशा पर्दे में रहना चाहिए. जब वे दूर का सफ़र करें तो उनके साथ कोई मर्द होना चाहिए. क्या ये विचार उनको मंज़ूर हैं? तौहीद हुसैन कहते हैं, "सबसे पहली बात, ये स्वीकार्य विचार नहीं हैं. मुझे नहीं लगता कि बांग्लादेश में ऐसा होने वाला है." एक तरफ़ भारत के साथ बांग्‍लादेश का रिश्ता बिगड़ता दिख रहा है. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते दशकों में सबसे बेहतर बताए जा रहे हैं. बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार डॉ. मोहम्‍मद यूनुस और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के बीच बैठकें भी हुई हैं. पिछले साल पाकिस्तानी विदेश मंत्री की बांग्लादेश की यात्रा भी हुई. हमने व‍िदेशी मामलों के सलाहकार से जानना चाहा क‍ि पाक‍िस्‍तान के साथ बढ़ते इस नए रिश्ते के पीछे सोच क्या है. तौहीद हुसैन कहते हैं, "हमारी तरफ़ से भारत के साथ रिश्तों को नीचे ले जाने का कोई क़दम नहीं उठाया गया. मैं आपको भरोसा दिलाता हूँ. बाक़ी दिल्ली में मेरे समकक्षों से पूछिए कि यह ऐसा क्यों हुआ.'' ''जहाँ तक पाकिस्तान का मामला है, पिछले शासनकाल में पूरे वक़्त रिश्तों को जानबूझकर बिगाड़ा गया. उससे पहले हमारे ठीक-ठाक रिश्ते थे.'' ''हमारे पाकिस्तान के साथ कुछ मुद्दे हैं. हम उन मुद्दों पर काम कर रहे हैं. लेकिन शेख़ हसीना ने जब जानबूझकर रिश्ते बिगाड़ने का फ़ैसला किया, तब ये गिरावट शुरू हुई. यह चक्र चलता रहा.'' ''हमने और कुछ हद तक मैंने भी, पाकिस्तान के साथ सामान्य रिश्ता बनाने की फिर से कोशिश की है. इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है. वह एक पड़ोसी देश है. दोस्ताना देश.'' ''तो आख़‍िर हुआ क्‍या? कम से कम हमारी तरफ़ से भारत के साथ संवाद कम करने की कोई पहल या कोश‍िश नहीं हुई. मैं इस बात का भरोसा द‍िलाता हूँ.'' ''जहाँ तक पाक‍िस्‍तान का मामला है. पाकिस्तान ने पहल की. हमने जवाब दिया. हम एक सामान्य रिश्ता चाहते हैं. सामान्य व्यापार‍िक र‍िश्‍ता. सामान्य मेलजोल-संवाद. सामान्य आर्थिक र‍िश्ता..." हमने उनसे पूछा क‍ि भारत में इसे जानबूझकर भारत व‍िरोधी रुख़ के तौर पर देखा जा रहा है. इस पर उनके क्‍या ख़याल हैं. तौहीद हुसैन कहते हैं, "आपको अपने रिश्तों के बारे में फ़ैसला लेने का हक़ है. जब बांग्लादेश अपने रिश्तों के बारे में फ़ैसला ले तो उसकी इज़्ज़त की जानी चाहिए.'' उनका मानना है, ''भारत और पाकिस्तान के रिश्ते पूरी तरह शत्रुतापूर्ण हैं. अगर मैं साफ़ कहूँ, तो वे एक-दूसरे को दुश्मन मानते हैं.'' ''हम किसी के दुश्मन नहीं हैं. न भारत के और न पाकिस्तान के.'' ''हम पाकिस्तान के साथ वही रिश्ता रखेंगे जो हमें अपने हित में लगता है.'' तौहीद वीज़ा व्‍यवस्‍था के बारे में ध्‍यान द‍िलाते हैं. वह कहते हैं, ''अगर वीज़ा नहीं म‍िलने की वजह से लोग भारत नहीं जा पा रहे हैं और वे पाकिस्तान जाना चाहते हैं, तो हमारी तरफ़ से कोई समस्या क्‍यों होनी चाह‍िए. भारत को इससे क्या एतराज़ होना चाहिए?" उन्‍होंने कहा, "बांग्लादेश के लोग इलाज के लिए भारत जाते थे. उन्होंने न भारत सरकार से मदद माँगी, न भारतीय समाज से. उन्होंने पैसे दिए. इलाज कराया. ये हमारे लिए भी अच्छा था. भारत के लिए भी." ''कई अस्पतालों का बड़ा कारोबार बांग्लादेश से चलता था. अब वह कारोबार ख़त्म हो गया. यह आपका फ़ैसला है कि आपने तय किया कि हमें बांग्लादेशी मरीज़ नहीं चाहिए.'' तौहीद बताते हैं, ''हमारे मरीज़ अब चीन जा रहे हैं. थाईलैंड जा रहे हैं. यहाँ तक क‍ि तुर्की जा रहे हैं." बीबीसी ने अपनी ख़ास रिपोर्ट में बताया है क‍ि भारत के विदेश मंत्रालय ने अब बांग्लादेश को 'नॉन-फ़ैमिली पोस्टिंग' की श्रेणी में रखा है. यही नहीं अपने राजनयिकों के परिवारों को वापस बुलाने को कहा है. यानी बांग्लादेश अब पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान या सूडान जैसी श्रेणी में है. बीबीसी ने तौहीद हुसैन से पूछा क‍ि बांग्लादेश भारत को सुरक्षा का भरोसा क्यों नहीं दे पाया. इस पर उन्‍होंने कहा, "आपके सवाल का आख़िरी हिस्सा मुझे पूरी तरह नामंज़ूर है. इसका कोई सबूत नहीं है कि हम भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाए.'' ''भारत अगर बांग्लादेश को पाकिस्तान के बराबर श्रेणी में रखता है तो ये उनका फ़ैसला है. ब‍िल्‍कुल, ये अफ़सोसनाक है. लेकिन मैं उनका फ़ैसला बदल नहीं सकता.'' ''अगर हमें अच्छे द्विपक्षीय रिश्ते चाहिए तो सबसे पहले हमें तय करना होगा कि हम वाक़ई अच्छे रिश्ते चाहते हैं. अगर हम एक के बाद एक ऐसे क़दम उठाते रहे जो रिश्तों को नीचे की तरफ़ ले जाएँ तो ऐसा ही होगा." "पिछले क़रीब 40 सालों में अलग-अलग भूमिकाओं में भारत के साथ अपने तजुर्बे को देखूँ तो मुझे लगता है कि भारत ने कुछ हद तक ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया दी है. मैं भारत से ज़्यादा बेहतर प्रतिक्रिया की उम्मीद करता था." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

स्रोत: BBC Hindi

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