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निशांत कुमार जेडीयू में हुए शामिल, क्या इस एंट्री के साथ शुरू होगी बड़ी परीक्षा

✍️ Admin 📅 08 March, 2026 ⏰ 02:16 PM 👁 61 views

जुलाई 2025 की बात है. नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार अपने जन्मदिन के मौके पर पिता से आशीर्वाद लेने पहुंचे थे. उन्होंने पिता को गले लगाने की कोशिश की. निशांत ने कहा कि उनके पिता ही बिहार के अगले मुख्यमंत्री होंगे. प्रदेश में एनडीए की सरकार बनेगी और गठबंधन अच्छे बहुमत से जीतेगा. निशांत का इस तरह पिता के लिए स्नेह ज़ाहिर करना और कोई राजनीतिक बयान देना एक दुर्लभ मौका था. लेकिन बीते एक साल में ये मौके कई बार आए. बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें निशांत की सार्वजनिक जीवन में सक्रियता बढ़ने लगी और इसी के साथ ये कयास भी कि शायद वह जल्द राजनीति में कदम रखेंगे. लेकिन यह इन परिस्थितियों में होगा इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी. नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फ़ैसले के दूसरे ही दिन यह फ़ैसला भी हो गया है कि निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री होने जा रही है. रविवार, 8 मार्च को पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय झा की मौजूदी में वो जेडीयू में शामिल हो गए. मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. 6 मार्च को पार्टी के विधानमंडल सदस्यों और सांसदों के साथ नीतीश कुमार की हुई आपात बैठक के बाद सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि निशांत पार्टी में शामिल होने जा रहे हैं. जनता दल यूनाइटेड के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने शुक्रवार देर रात पार्टी मीटिंग के बाद मीडिया से बातचीत में कहा, "कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और विधायकों ने निशांत कुमार के राजनीति में आने की मांग की. निशांत कुमार कल जेडीयू की सदस्यता ग्रहण करेंगे." उन्होंने कहा, "निशांत कुमार ने यह तय किया है कि वो पूरे राज्य का दौरा भी करेंगे." नीरज कुमार ने बताया, ''नीतीश कुमार ने पार्टी के विधायकों को आश्वस्त किया है कि जैसे मुख्यमंत्री के तौर पर वह सक्रिय रहा करते थे, ठीक उसी तरह अब भी सभी के संपर्क में रहेंगे." हालांकि नीरज कुमार ने यह स्पष्ट नहीं किया कि निशांत कुमार सरकार का हिस्सा होंगे या नहीं. लेकिन उनकी इस घोषणा से दूसरी कुछ चीज़ें ज़रूर स्पष्ट हुईं. जैसे, नीतीश कुमार के बाद पार्टी की लीडरशिप और उसके भविष्य को लेकर गहराते सवालों के जवाब अब शायद निशांत कुमार की सक्रिय राजनीति में एंट्री के बाद मिल जाएंगे. दरअसल, नीतीश कुमार के राज्यसभा नामांकन का पर्चा भरने के बाद से ही उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं में भारी रोष है. कार्यकर्ताओं का कहना है कि नीतीश कुमार को अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि उनकी अनुपस्थिति में पार्टी की राजनीतिक दिशा और नेतृत्व को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है. वहीं समाजवादी धारा से निकले वरिष्ठ नेताओं और नीतीश कुमार के क़रीबी रहे लोगों का भी मानना है कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फ़ैसले से जेडीयू के अस्तित्व और भविष्य पर संकट गहरा सकता है. नीतीश कुमार के पूर्व सहयोगी और मित्र रहे प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि जनता दल यूनाइटेड में नीतीश कुमार के बाद कोई दूसरा नेतृत्व नहीं है. उनके मुताबिक़, ''राजनीतिक विचारधारा का अभाव पहले ही हो गया था और जो मूल्य बचे थे पार्टी में...फिर चाहे वो राजनीतिक हों या नैतिक, वो सब नीतीश कुमार के अपने ही थे और अब जब नीतीश कुमार नेतृत्व नहीं करेंगे तो मैं नहीं समझता हूं कि जेडीयू बहुत दिनों तक टिक पाएगी.'' वरिष्ठ समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी का मानना है कि नीतीश कुमार की पार्टी में फ़िलहाल ऐसा कोई नहीं है, जो पूरी पार्टी को एक साथ जोड़ कर रख सके. वो कहते हैं, '' इस स्थिति में धीरे-धीरे दो ही विकल्प खुलेंगे, पहला कि लोग बीजेपी में जाएं और दूसरा आरजेडी में.'' शिवानंद तिवारी जनता दल यूनाइटेड के सामने खड़े नेतृत्व के इस संकट के लिए नीतीश कुमार को ही ज़िम्मेदार मानते हैं. उनके मुताबिक़, ''नीतीश कुमार के साथ सबसे बड़ी दिक्कत रही कि उन्होंने किसी पर भरोसा ही नहीं किया. आरसीपी सिंह एक ज़माने में उनके नज़दीकी थे, मगर आरसीपी ख़त्म हो गए. प्रशांत किशोर आए...तब उनके बारे में उन्होंने कहा कि यही हमारे भविष्य हैं, पर वह भी ख़त्म हो गए. तो उन्होंने किसी ऐसे को आगे नहीं किया, जो पार्टी को जोड़कर रख सके. अब नतीजा ये है कि नीतीश कुमार गए तो पार्टी बचेगी या नहीं इस पर बहस हो रही है.'' हालांकि वरिष्ठ पत्रकार और लेखक संतोष सिंह का मानना है कि जेडीयू के लिए साल 2030 तक कोई ख़तरा नहीं है. उसके बाद भी पार्टी अपनी प्रासंगिकता बनाए रख सकती है, यहां तक कि अच्छा मुकाबला कर सकती है, अगर पार्टी में निशांत कुमार की एंट्री हो जाए. वह कहते हैं, ''पार्टी को भी लगता है कि एक व्यक्ति जो जेडीयू को बचा सकता है और 2030 के चुनाव तक पार्टी को ले जा सकता है, वह निशांत ही है.'' छात्र राजनीति से शुरू हुई नीतीश कुमार की सियासी यात्रा ने बीते दो दशकों में न सिर्फ़ बिहार की सत्ता की दिशा तय की, बल्कि उन्होंने अपनी पार्टी जनता दल यूनाइटेड को राज्य की राजनीति का एक अहम केंद्र बना दिया. जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार मानते हैं कि नीतीश कुमार के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाला पार्टी में दूसरा कोई नहीं है. वह कहते हैं, ''नीतीश कुमार ने जो काम किया है, वह जाति-धर्म से ऊपर उठकर किया है लेकिन उनकी इस विरासत को कैसे बनाए रखा जाए, फ़िलहाल पार्टी के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है.'' पार्टी में नीतीश कुमार के बाद के खालीपन पर नीरज कहते हैं, ''राजनीति में ऐसी स्थिति कभी नहीं होती. नीतीश कुमार जी के नैतिक बल की राजनीति का विकल्प ज़रूर निकलेगा और पार्टी इस धारा को मिटने नहीं देगी.'' नीरज कुमार निशांत कुमार को नीतीश कुमार का नैतिक बल बताते हैं. उनका कहना है कि नैतिक बल वाला व्यक्ति ही नीतीश कुमार की विरासत को आगे बढ़ा सकता है. पर नीतीश कुमार के क़रीबी रहे प्रेम कुमार मणि और शिवानंद तिवारी इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखते. दरअसल, प्रेम कुमार मणि इसे वंशवाद की राजनीति से जोड़कर देखते हैं. उनका कहना है, ''उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के बाद उनके बेटे अखिलेश यादव आए, बिहार में लालू प्रसाद यादव के बाद उनके बेटे तेजस्वी यादव आगे बढ़े और अब नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के आने की बात हो रही है. इसे आप कबायली सोच भी कह सकते हैं और जातिवादी राजनीति का गणित भी.'' वो कहते हैं, ''मैं निशांत को बचपन से जानता हूं. वह बहुत प्यारा बच्चा है और उसमें किसी तरह का लोभ नहीं है. लेकिन वह बिल्कुल भी राजनीतिक व्यक्ति नहीं है. अगर वह पार्टी में कोई पद पा भी जाते हैं, तो हो सकता है कुछ महीनों या सालभर तक टिक जाएं, लेकिन बिना किसी राजनीतिक समझ और विचार के राजनीति करना संभव नहीं है.'' शिवानंद तिवारी यह सवाल भी उठाते हैं कि अगर पार्टी की बागडोर निशांत के हाथों में ही देनी थी, तो यह प्रक्रिया पहले शुरू होनी चाहिए थी. उनके मुताबिक, "उन्हें पहले ही मैदान में उतार देना चाहिए था, ताकि वह पूरे बिहार में घूमते, कार्यकर्ताओं से मिलते और राजनीति की बारीकियों को समझते. लेकिन सिर्फ इसलिए कि वह बेटे हैं और अचानक उन्हें नेतृत्व दे दिया जाए, यह ठीक नहीं है." तिवारी तुलना करते हुए कहते हैं, "लालू प्रसाद यादव ने अपने बेटे को राजनीति में लाने से पहले कुछ हद तक प्रशिक्षित करने की कोशिश की थी. वहीं मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव को 'साइकिल' पर बैठाकर पूरे उत्तर प्रदेश में घुमाया था. लेकिन ऐसा कुछ भी निशांत के साथ देखने को नहीं मिला.'' प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी की तरफ़ से फ़िलहाल निशांत की राजनीतिक एंट्री पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. लेकिन फ़रवरी 2025 में अपने एक बयान में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने निशांत की पॉलिटिक्स में आने से जुड़ी अटकलों पर कहा था, '' मुझे असल में खुशी होगी अगर वह राजनीति में आते हैं. शायद इससे जेडीयू को एक नई ज़िंदगी मिल जाए. नीतीश जी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगभग अपने नियंत्रण में ले लिया है.वही मोदी जिन्होंने कभी उनके डीएनए पर सवाल उठाया था.'' निशांत नीतीश कुमार के इकलौते बेटे हैं. उन्होंने अपने पिता की तरह ही इंजीनियरिंग की डिग्री ली हुई है. उनकी स्कूली शिक्षा पटना और मसूरी में हुई है. बाद में उन्होंने रांची से अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की. निशांत क़रीब 50 साल के हो चुके हैं, मुख्यमंत्री का बेटा होने के बाद भी वो अपने पिता की सियासी ज़िंदगी से अब तक दूर रहते आए हैं और ख़ुद को काफ़ी लो प्रोफ़ाइल रखते हैं. उन्होंने अब तक शादी भी नहीं की है. जल्द ही वह अपने करियर की एक नई पारी की शुरुआत करने जा रहे हैं अगर उन्हें भविष्य में अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभालने का मौका दिया जाता है, तो उनकी आगे की राह में कई चुनौतियां होंगी. परिवारवाद के आरोपों का सामना करने से लेकर खुद को साबित करने और बिहार की जनता के भरोसे को जीतने तक. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi

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