ट्रंप के ख़िलाफ़ अमेरिका भर में क्यों हो रहे व्यापक विरोध प्रदर्शन
अमेरिका के कई शहरों में ट्रंप प्रशासन के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. यह 'नो किंग्स' रैलियों का तीसरा दौर है, जिनमें पहले भी लाखों की संख्या में लोग शामिल हो चुके हैं. आयोजकों का कहना है कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लागू की गई नीतियों का विरोध कर रहे हैं, जिनमें ईरान के साथ जंग, संघीय इमिग्रेशन कानून और बढ़ती महंगाई शामिल हैं. आयोजकों ने कहा, "ट्रंप हम पर एक निरंकुश शासक की तरह राज करना चाहते हैं. लेकिन यह अमेरिका है और सत्ता जनता के हाथों में होती है, न कि उन लोगों या उनके अरबपति साथियों के हाथों में है जो ख़ुद को राजा समझते हैं." व्हाइट हाउस के एक प्रवक्ता ने इन विरोध प्रदर्शनों को "ट्रंप डिरेंजमेंट थेरेपी सेशन" (ट्रंप-विरोधी मानसिक इलाज) करार दिया और कहा कि "इनकी परवाह सिर्फ़ वे रिपोर्टर करते हैं, जिन्हें यह कवर करने के लिए पैसे मिलते हैं." बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें शनिवार को पूरे दिन, न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन डीसी और लॉस एंजेलिस सहित अमेरिका के लगभग हर बड़े शहर में प्रदर्शन हुए. राजधानी वॉशिंगटन डीसी के डाउनटाउन की सड़कों पर पूरे दोपहर रैलियाँ होती रहीं, जिसमें लोगों की भारी भीड़ प्रदर्शन कर रही थी. प्रदर्शनकारियों से लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों पर कतारें लग गईं और नेशनल मॉल खचाखच भर गया. 'नो किंग्स' के पिछले प्रदर्शनों की तरह ही, इस बार भी प्रदर्शनकारियों ने ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और प्रशासन के अन्य अधिकारियों के पुतले लहराए. उन्हें पद से हटाने और गिरफ़्तार करने की मांग की. शनिवार को हुए 'नो किंग्स' विरोध प्रदर्शनों में से एक प्रमुख प्रदर्शन मिनेसोटा में हुआ. यहाँ जनवरी में दो अमेरिकी नागरिकों, रेनी निकोल गुड और एलेक्स प्रेटी को मौत संघीय इमिग्रेशन एजेंटों की कार्रवाई में हुई थी. उनकी मौत से लोगों में भारी गुस्सा भड़का और ट्रंप प्रशासन की इमिग्रेशन नीतियों के ख़िलाफ़ पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए थे. हज़ारों लोग हाथों में तख्तियाँ लिए सड़कों पर उतर आए और डेमोक्रेटिक पार्टी के कई जाने-माने नेताओं ने भी सेंट पॉल स्थित स्टेट कैपिटल बिल्डिंग के बाहर मंच से लोगों को संबोधित किया. ब्रूस स्प्रिंगस्टीन ने भी मंच पर आकर इमिग्रेशन नीतियों के विरोध में अपना गीत "स्ट्रीट्स ऑफ़ मिनियापोलिस" प्रस्तुत किया. न्यूयॉर्क शहर के टाइम्स स्क्वायर में भी हज़ारों लोग जमा हुए और मैनहैटन के मिडटाउन इलाक़े से होते हुए मार्च निकाला. यहाँ भीड़ के लिए रास्ता बनाने के लिए पुलिस को आम तौर पर व्यस्त रहने वाली सड़कों को बंद करना पड़ा. अक्तूबर में हुई रैली के बारे में न्यूयॉर्क पुलिस ने बताया कि शहर के सभी पाँचों इलाक़ों में एक लाख से ज़्यादा लोग इकट्ठा हुए थे. अक्तूबर में हुई पिछली 'नो किंग्स' रैली में पूरे देश से लगभग 70 लाख लोग जमा हुए थे. अमेरिका के कई राज्यों ने नेशनल गार्ड को तैनात किया, लेकिन आयोजकों का कहना है कि ये कार्यक्रम शांतिपूर्ण हैं. जनवरी 2025 में व्हाइट हाउस लौटने के बाद से, ट्रंप ने राष्ट्रपति की शक्तियों का दायरा बढ़ा दिया है. उन्होंने एग्जीक्यूटिव ऑर्डर का इस्तेमाल करके संघीय सरकार के कुछ अधिकारों को ख़त्म कर दिया है और राज्यों के गवर्नरों की आपत्तियों के बावजूद अमेरिकी शहरों में नेशनल गार्ड के सैनिकों को तैनात किया है. राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रशासन के शीर्ष कानून प्रवर्तन अधिकारियों से अपने कथित राजनीतिक दुश्मनों पर मुक़दमा चलाने के लिए भी कहा है. राष्ट्रपति का कहना है कि संकट में घिरे देश को फिर से बनाने के लिए उनके ये कदम ज़रूरी हैं. और उन्होंने उन आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है कि वे एक तानाशाह की तरह बर्ताव कर रहे हैं. उन्होंने इन आरोपों को 'हिस्टीरिकल' (बेतुका) बताया है. अक्तूबर में फॉक्स न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "वे मुझे राजा कह रहे हैं. मैं राजा नहीं हूँ." लेकिन आलोचकों ने चेतावनी दी है कि उनके प्रशासन के कुछ क़दम असंवैधानिक हैं और अमेरिकी लोकतंत्र के लिए ख़तरा हैं. इन विरोध प्रदर्शनों में अमेरिका में बड़े शहरों और छोटे कस्बों दोनों जगहों पर भीड़ देखी गई. बोस्टन (मैसाचुसेट्स), नैशविले (टेनेसी) और ह्यूस्टन (टेक्सस) में 'नो किंग्स' रैलियां हुईं. शेल्बीविले (केंटकी) और हॉवेल (मिशिगन) जैसे शहरों की सड़कों पर भी लोग सड़कों पर दिखे. जबकि हॉवेल की आबादी तो सिर्फ़ दस हज़ार के आस-पास है. लोग अपने-अपने इलाक़ों में ईरान में चल रहे युद्ध और इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (आसीई) के विरोध में तख्तियाँ लिए नज़र आए. विदेशों में रह रहे अमेरिकी प्रवासी भी विरोध प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए. पेरिस, लंदन और लिस्बन में कई लोग ऐसे पोस्टर थामे दिखाई दिए जिनमें राष्ट्रपति को 'फासीवादी' और 'युद्ध अपराधी' बताया गया था. साथ ही राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने और उन्हें पद से हटाए जाने की मांग की गई. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
स्रोत: BBC Hindi