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प्रियंका गांधी ने किया 'चाणक्य' का ज़िक्र तो पीएम मोदी बोले, 'नहीं होगा अन्याय': परिसीमन बिल को लेकर संसद में तीखी बहस

✍️ Admin 📅 17 April, 2026 ⏰ 08:43 AM 👁 61 views

गुरुवार को शुरू हुए संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र में मोदी सरकार ने महिला आरक्षण और डीलिमिटेशन (परिसमन) बिल पेश कर दिया. इसके साथ ही संसद और संसद के बाहर पक्ष-विपक्ष में तीखी बयानबाज़ी शुरू हो गई है. कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने इसे 'अगले चुनाव के लिए बीजेपी की रणनीति' कहा वहीं शशि थरूर ने 'डीलिमिटेशन की डीमोनेटाइज़ेशन' से तुलना की. दक्षिण भारत में डीलिमिटेशनका तीख़ा विरोध हो रहा है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने डीलिमिटेशन बिल का विरोध जताया. बीआरएस ने भी केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष करने का एलान कर दिया है. विपक्षी पार्टियों का कहना कि सरकार की मंशा महिला आरक्षण लागू करने की है ही नहीं. विपक्ष के मुताबिक़ वो महिला आरक्षण सरकार का समर्थन करेंगे लेकिन सरकार डीलिमिटेशन को इससे जोड़कर मामले को उलझा रही है. बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें बता दें कि प्रस्तावित बिल में लोकसभा में सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है. साथ ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का भी प्रस्ताव है. हालांकि महिला आरक्षण का ये प्रस्ताव 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर आधारित है, जिसमें महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसके लागू होने को भविष्य में होने वाली जनगणना और डीलिमिटेशन (परिसीमन प्रक्रिया) से जोड़ा गया था. मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. परिसीमन पर प्रधानमंत्री ने कहा कि "मैं आज ज़िम्मेदारी से कहना चाहता हूं कि निर्णय प्रक्रिया किसी के साथ भेदभाव नहीं करेगी. किसी के साथ अन्याय नहीं होगा." "पहले जो परिसीमन हुआ है और जो अनुपात पहले से चला आ रहा है, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा. उसी के अनुसार परिसीमन होगा." उन्होंने कहा, "अगर गारंटी चाहिए, तो मैं गारंटी भी देता हूं." प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण बिल के पक्ष में बोलते हुए कहा, "जो आज इस बिल का विरोध करेंगे, उन्हें लंबे समय तक इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. उन्होंने कहा कि अब देश की बहनों पर भरोसा करें, 33 फ़ीसदी महिलाओं को यहां आने दें और उन्हें निर्णय करने दें." उन्होंने कहा कि देश की 50 फ़ीसदी आबादी को नीति-निर्माण में शामिल होना चाहिए, "मुझे सबको साथ लेकर चलना है और मुझे संविधान ने यही सिखाया है." प्रधानमंत्री ने कहा कि "हम भ्रम में न रहें कि हम कुछ नारी शक्ति को दे रहे हैं, ये उनका हक़ है. और हमने कई दशकों से रोका हुआ है, आज उसका प्रायश्चित कर हमें उस पाप से मुक्ति पाने का अवसर है." इससे पहले केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में डीलिमिटेशन बिल पर बहस के दौरान कहा कि इस प्रक्रिया के बाद हर राज्य में लोकसभा सीटों की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ जाएगी. उन्होंने कहा, "सभी राज्यों में कुल मिलाकर लोकसभा सीटों की संख्या 815 हो जाएगी जिसमें से 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी." जेडीयू सांसद राजीव रंजन सिंह ने कहा, "नारी शक्ति वंदन विधेयक सबकी सहमति से पास हुआ था और प्रधानमंत्री चाहते हैं कि 2029 के चुनाव में उसे लागू किया जाए. यह महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में बहुत बड़ा कदम है, मील का पत्थर साबित होगा. देश की 50 फ़ीसदी आबादी महिलाओं की है और अगर प्रधानमंत्री उनको न्याय देने का प्रयास कर रहे हैं तो उसका विरोध नहीं होना चाहिए, समर्थन करना चाहिए." विपक्ष ने महिला आरक्षण का समर्थन किया लेकिन उसे डीलिमिटेशन से जोड़ने का विरोध किया. कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने इस बिल पर चर्चा के दौरान कहा, "जब 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने यह अधिनियम सर्वसहमति से पारित किया था तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी विचारधारा के अनुकूल इसका पूरा समर्थन किया था. आज भी इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि भारतीय राष्ट्र कांग्रेस महिला आरक्षण के पक्ष में डटकर खड़ी है और खड़ी रहेगी." उन्होंने आगे कहा, "ऊपर ऊपर से इसमें (बिल में) कोई आपत्तिजनक बात नहीं लगती. मगर इसे गहराई से समझा जाए तो इसका असली मकसद उभरता है, वह राजनीति की बू, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री महोदय ने किया, वह राजनीति की बू इसमें पूरी तरह से घुली हुई है." "दरअसल इसी सरकार ने महिला आरक्षण का जो विधेयक सर्वसम्मति से 2023 में पारित कराया था उसमें दो चीजें थी जो इस विधेयक में नहीं हैं. उसमें लिखा था कि इसे लागू करने से पहले नई जनगणना और परसीमन कराया जाएगा. अब अचानक क्या हो गया? मन बदल गया? वही सरकार पुराने आंकड़ों के आधार पर क्यों आगे बढ़ना चाह रही है? और इतनी जल्दबाजी क्यों?" प्रियंका गांधी ने परिसीमन बिल को लेकर बीजेपी पर तंज़ किया. उन्होंने कहा, "कुछ प्रदेशों की ताक़त कम करके लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाकर अगले चुनाव के लिए अपनी पार्टी की मजबूती का ढांचा बनाया जा रहा है. गृह मंत्री जी हंस रहे हैं. पूरी योजना बना रखी है. चाणक्य आज ज़िंदा होते तो आपकी राजनीतिक कुटिलता पर वो भी चौंक जाते." प्रियंका गांधी ने ये बात मुस्कराते हुए कही. कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा, "महिला आरक्षण में कोई दिक्कत नहीं है, तुरंत कर दें लेकिन इसमें डीलिमिटेशन शामिल क्यों कर रहे हो? यही हमारा सबसे बड़ा प्रश्न है. डीलिमिटेशन को लेकर बहुत सारे मुद्दे हैं, बहुत सारे प्रश्न हैं, इस पर लंबी चर्चा की ज़रूरत है. यह चर्चा कराने को सरकार तैयार नहीं है, वह दो-तीन दिन में इसे ख़त्म करना चाहती है, यह नहीं हो पाएगा." "अगर सरकार सिर्फ़ महिला आरक्षण बिल पास करवाना चाहती है तो 2023 में कर लेती, तब क्यों नहीं किया? अब भी करवाना चाहती है तो तुरंत करवाए, हम वोट देने को तैयार हैं. आप डीलिमिटेशन वैसे ही करना चाहते हैं जैसे डीमोनेटाइज़ेशन किया था- बिना सोचे-समझे. इसका आधार क्या है यह भी साफ़ नहीं है, सिर्फ़ आबादी के आधार पर नहीं हो सकता." समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने भी कमोबेश यही बात कही. उन्होंने कहा, "सारी पार्टियां एकमत हैं महिला आरक्षण को लेकर लेकिन बार-बार यह विधेयक का स्वरूप क्यों बदला जा रहा है? अगर भारतीय जनता पार्टी चाहती है तो जो 543 सीटें हैं उन पर 2029 के लिए आरक्षण कर दीजिए, समाजवादी पार्टी तैयार है समर्थन करने के लिए." लेकिन ताज़ा जनगणना के बिना डीलिमिटेशन कराने पर उन्होंने सवाल खड़ा किया. उन्होंने कहा, "2023 में जिस स्वरूप में नारी शक्ति वंदन विधेयक पास हुआ था, हम सब तैयार हैं उसके लिए. 2011 की जनगणना लेकर आप कैसे डीलिमिटेशन कर सकते हैं? इससे पता चलता है कि यह विधेयक दोहरे चरित्र वाला लग रहा है... कोई विश्वास नहीं करेगा भारतीय जनता पार्टी पर." दक्षिण भारत के राज्यों में इस विधेयक को लेकर गहरी आशंकाएं हैं. विपक्षी दलों का आरोप है कि इससे उत्तर भारत के राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ेगी, जहां बीजेपी तुलनात्मक तौर पर ज़्यादा ताक़तवर है और इससे उसके लिए केंद्र में सरकार बनाना आसान हो जाएगा. डीलिमिटेशन का सबसे मुखर विरोध करने वालों में डीएमके शामिल है. डीएमके का आरोप है कि इससे दक्षिण भारतीय राज्यों की केंद्र की राजनीति में ताक़त कम होगी. डीएमके अध्यक्ष और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने गुरुवार को काला झंडा फहराकर डीलिमिटेशन के फ़ैसले का विरोध किया है. केंद्र सरकार के इस फ़ैसले का विरोध करने के लिए उन्होंने अपने समर्थकों के साथ काले कपड़े भी पहन रखे थे. इस दौरान उन्होंने डीलिमिटेशन विधेयक की कॉपी जलाकर अपना विरोध जताया. डीएमके को एक और दक्षिण भारतीय पार्टी बीआरएस का मिला है. बीआरएस नेता रावुला श्रीधर रेड्डी का कहना है, "बीआरएस ने हमेशा महिला आरक्षण का समर्थन किया है लेकिन केंद्र सरकार महिला आरक्षण की प्रक्रिया को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ने की कोशिश कर रही है, जो ग़लत है." "हमारे नेता, केटी रामा राव, लगातार परिसीमन प्रक्रिया में दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों की रक्षा करने की बात कह रहे हैं, लेकिन केंद्रीय मंत्री बार-बार दावा कर रहे हैं कि देश भर में संसद और राज्यों के विधायी निकायों दोनों में सीटों में 50% की वृद्धि होगी, जबकि प्रस्तावित विधेयक में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. यह एक साज़िश जैसा दिखती है. इससे केंद्र की सत्यनिष्ठा और पूरी प्रक्रिया के उद्देश्य पर संदेह पैदा हो रहा है." उन्होंने डीलिमिटेशन प्रक्रिया पर बुलडोज़र चलाने का आरोप लगाते हुए कहा, "यह ठीक है कि यह बहुत समय से लंबित है लेकिन बिना पर्याप्त चर्चा के, बिना राष्ट्रीय आम राय बनाए अगर एनडीए सरकार पूरी प्रक्रिया पर बुलडोज़र चलाना चाहती है." उन्होंने कहा, "अगर यह प्रक्रिया दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों को किसी प्रकार का नुक़सान पहुंचाती है तो बीआरएस पार्टी उन पार्टियों से हाथ मिलाएगी जो इस मुद्दे का विरोध कर रहे हैं और केंद्र सरकार से संघर्ष करेगी ताकि दक्षिण भारतीय राज्यों को उचित न्याय मिल सके." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi

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