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ममता बनर्जी के मज़बूत क़िले में कैसे हुई बीजेपी की एंट्री

✍️ Admin 📅 04 May, 2026 ⏰ 09:27 PM 👁 38 views

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम लगभग साफ़ हैं. चुनाव आयोग के मुताबिक़, बीजेपी ने 136 सीटों पर जीत दर्ज कर ली है और 72 सीटों पर आगे चल रही है. कुल मिलाकर बीजेपी 208 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. दूसरी ओर 15 सालों से सत्ता पर काबिज़ टीएमसी ने 49 सीटों पर जीत दर्ज की है और 30 सीटों पर आगे है. बीजेपी सरकार बनाने की ओर है और ममता की सीएम की कुर्सी लगभग जा रही है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीजेपी पर 'वोट लूट' का आरोप लगाया है. उन्होंने पत्रकारों से कहा, "बीजेपी ने 100 से ज्यादा सीटों की लूट की है. बीजेपी ने धोखाधड़ी की है. चुनाव आयोग अब बीजेपी आयोग बन गया है. हमने समय-समय पर इसकी शिकायत की है. लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था.'' ममता बनर्जी ने कहा, "बीजेपी की जीत अनैतिक है. इलेक्शन कमीशन ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के साथ मिलकर जो किया है वो पूरी तरह अनैतिक है. उन्होंने ज़ोर-ज़बरदस्ती से एसआईआर किया. अत्याचार किया. काउंटिंग एजेंटों को गिरफ़्तार किया है. हम वापसी करेंगे.'' पश्चिम बंगाल में 34 साल लंबे चले वामपंथी शासन को ममता बनर्जी ने सत्ता से बेदख़ल किया था. साल 2011 में जब उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला तो न केवल उनके विरोधियों, बल्कि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने भी उनके शासन चलाने की क्षमता को लेकर शंका ज़ाहिर की थी. उनकी राजनीतिक परिपक्वता को लेकर भी संशय जताया गया. लेकिन बीते 15 सालों में इन शंकाओं और सवालों का जवाब ख़ुद बंगाल की राजनीति ने ही दे दिया. ममता बनर्जी एक नहीं लगातार तीन बार राज्य की मुख्यमंत्री चुनी गईं. अगर इस बार भी ममता अपनी पार्टी को फिर से जीत दिलातीं तो वह पश्चिम बंगाल की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन सकती थीं जिन्होंने लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीतकर इतिहास बनाया हो. हालांकि रुझानों को देखते हुए अब ये नामुमकिन है. इस इंटरएक्टिव कंटेंट को देखने के लिए जावास्क्रिप्ट वाली एक आधुनिक ब्राउज़र और बेहतर इंटरनेट कनेक्शन की ज़रूरत है. मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. साल 2021 में पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव जहां आठ चरणों में करवाया गया था, वहीं इस बार के चुनाव केवल दो चरणों में हुए. राज्य में मतदान 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को हुआ. इंडियन एक्सप्रेस की नेशनल ओपिनियन एडिटर वंदिता मिश्रा ने बीबीसी के स्पेशल प्रोग्राम में बताया कि इस चुनाव के दौरान महिलाओं का ये मानना था कि ममता बनर्जी ने योजनाओं के ज़रिए उनको बहुत कुछ दिया लेकिन वो नौकरी नहीं दे पाईं. वो कहती हैं, "टीएमसी के लोकल नेटवर्क में गुंडागर्दी, कट मनी, बिज़नेस नहीं करने देना और केंद्र से आने वाली योजनाओं का लाभ न मिलने का डर भी महिलाओं में था. साथ ही महिलाओं का कहना था कि उनके बच्चों को टीएमसी नौकरी नहीं दे पा रही है." कोलकाता में मौजूद बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा का कहना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान महिला सुरक्षा का मुद्दा काफ़ी अहम रहा, वो खुलकर कह रही थीं कि बीजेपी आएगी तो उनको सुरक्षा मिलेगी. कोलकाता में अगस्त 2024 में आरजी कर मेमोरियल अस्पताल की महिला डॉक्टर के रेप और हत्या के बाद महिला सुरक्षा का मुद्दा चुनाव प्रचार के दौरान काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा. मृत डॉक्टर की मां को बीजेपी ने चुनावी मैदान में उतारा था और वो 28 हज़ार वोटों से जीती हैं. वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी ने बीबीसी संवाददाता प्रेरणा से बात करते हुए कहा था, "ममता बनर्जी के लिए 2011 का चुनाव जहां वामपंथी शासन को हटाने का चुनाव था, वहीं 2026 का चुनाव बंगाल को भारतीय जनता पार्टी से बचाने की लड़ाई है." इस चुनाव के दौरान ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती एंटी-इनकम्बेंसी यानी सत्ता विरोधी लहर थी. शिखा मुखर्जी का मानना था कि ममता के सामने क़ानून-व्यवस्था, बेरोज़गारी और विकास से जुड़े सवाल थे. विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) भी विवादित मुद्दा रहा. ममता बनर्जी ने इसके ख़िलाफ़ सड़क से लेकर संसद और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी. हालांकि इसके बावजूद राज्य में तक़रीबन 90 लाख मतदाताओं के वोट मतदाता सूची से कटे. शिखा मुखर्जी का कहना था कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों के नाम कटना अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी. आज़ादी के बाद यह पहला मौक़ा है जब पश्चिम बंगाल में कुल वोटरों की संख्या पिछले चुनावों के मुक़ाबले कम हुई है. साल 2021 के विधानसभा चुनावों में, राज्य में सात करोड़ 30 लाख 40 हज़ार रजिस्टर्ड वोटर थे, और कोविड के दौर में भी 82.3 प्रतिशत वोटिंग हुई थी. इस बार के चुनाव में मतदान का प्रतिशत इससे भी ज़्यादा था और कुल वोटिंग लगभग 92 प्रतिशत हुई. राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार का कहना है कि मुस्लिम तुष्टिकरण और घुसपैठियों का नैरेटिव पश्चिम बंगाल में बना और किसी पार्टी पर इसकी लैबलिंग हो जाए तो उसका कुछ इसी तरह का नतीजा होता है. "इस परिणाम का नतीजा यह भी दिखाता है कि अल्पसंख्यकों के आगे बहुसंख्यकों को नज़रअंदाज़ करने के नैरेटिव को आगे बढ़ाया गया जिसका फ़ायदा मिला." वरिष्ठ पत्रकार बिश्वजीत भट्टाचार्य ने बीबीसी संवाददाता प्रेरणा को बताया था कि तृणमूल कांग्रेस पर बीते सालों में भ्रष्टाचार के अलग-अलग आरोप भी ममता बनर्जी के लिए एक बड़ी चुनौती के तौर पर सामने आए. साल 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी तृणमूल कांग्रेस के विरोध में पीडीएस स्कैम, कैटल स्मगलिंग स्कैम, टीचर रिक्रूटमेंट स्कैम, मंत्रियों, नौकरशाहों की गिरफ़्तारी आदि मुद्दों की गूंज सुनाई दी थी. भट्टाचार्य के मुताबिक, ''शहरी इलाक़ों में ख़ासकर कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में ममता के ख़िलाफ़ नाराज़गी बढ़ी." बिश्वजीत भट्टाचार्य ने कहा था कि पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक मुद्दों पर वोटिंग बढ़ेगी, जिसका ख़ामियाज़ा ममता बनर्जी को उठाना पड़ सकता है. विश्लेषक मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी की विजयी बढ़त की वजह पार्टी संगठन भी रहा. उनका कहना है कि इस दौरान पार्टी ने मज़बूती से चुनाव लड़ा और बूथ स्तर पर संगठन को मज़बूत किया. वहीं तृणमूल कांग्रेस चुनाव के पहले तक योजनाओं की घोषणा करने में लगी हुई थी. आर्थिक रूप से कमज़ोर महिलाओं को मदद करने वाली 'लक्ष्मी भंडार स्कीम' में चुनाव से पहले भी वृद्धि की गई थी. स्कीम के तहत एससी/एसटी कैटेगरी की महिलाओं को हर महीने 1,200 रुपये और जनरल कैटेगरी की महिलाओं को 1000 रुपये प्रति माह दिए जाने लगे थे. वहीं विधानसभा चुनाव से पहले राशि में 500 रुपये की बढ़ोतरी की गई थी. मानदेय सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए 1500 रुपये और अनुसूचित जाति-जनजाति की महिलाओं के लिए 1700 रुपये प्रति माह कर दिया गया. वहीं 'बांग्लार युवा साथी' योजना के तहत राज्य के बेरोज़गार युवाओं को नौकरी मिलने तक आर्थिक सहायता देने के लिए हर महीने 1500 रुपये की सहायता देने का प्रावधान किया गया. यह सहायता 21 से 40 साल के उन युवाओं के लिए है जिन्होंने कम से कम दसवीं कक्षा पास की है और अभी रोज़गार की तलाश में हैं. चुनाव से पहले राज्य सरकार ने कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को मिलने वाले महंगाई भत्ते के भुगतान का फ़ैसला भी लिया. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक ख़बर के मुताबिक़, इसके तहत लगभग नौ लाख कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को करीब 10,000 करोड़ रुपये के डीए बकाये का भुगतान करने की घोषणा की गई. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi

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