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Death

बेघर महिलाओं के लिए क्या हैं रात के मायने, महरौली रेप के बाद बीबीसी की पड़ताल

✍️ Admin 📅 28 June, 2026 ⏰ 03:05 PM 👁 11 views

दिल्ली के महरौली इलाक़े में मेट्रो स्टेशन के पास फ़ुटपाथ पर एक 10 साल की लड़की अपने परिवार के साथ सो रही थी. सोमवार 22 जून के तड़के एक कैब ड्राइवर ने कथित तौर पर बच्ची को वहां से अगवा कर उसका रेप किया और उसके बाद हत्या कर दी. रिपोर्ट्स के मुताबिक कैब ड्राइवर ने शव को गुड़गांव-फ़रीदाबाद बॉर्डर के पास फेंक दिया. पुलिस ने इस मामले में अभियुक्त को गिरफ़्तार कर लिया है. लेकिन इस घटना ने बेघर बच्चियों और महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. रोज़ी-रोटी के लिए देश के तमाम राज्यों से बड़ी आबादी दिल्ली आती है. इनमें से कई परिवार स्थायी या अस्थायी घर का ख़र्च नहीं उठा पाते और सड़क, फ़ुटपाथ या ऐसे ही ठिकानों पर रहने को मजबूर हैं. कुल कितनी आबादी बिना छत के रह रही है, इसका कोई निश्चित आंकड़ा नहीं है. हालांकि बेघर लोगों पर काम करने वाले फ़ोरम शहरी अधिकार मंच के अनुमान के मुताबिक, साल 2024 में राजधानी में लगभग तीन लाख लोग बेघर थे, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं. वक्त के साथ यह संख्या बढ़ सकती है. सड़क किनारे सोना उनके लिए हर रात एक नए डर के साथ सोने जैसा है. कभी मौसम की मार उनकी नींद छीन लेती है, तो कभी तेज़ रफ्तार गाड़ियों के रौंद देने का ख़तरा मंडराता रहता है, लेकिन सबसे गहरा डर छेड़छाड़ और रेप का है. यह ख़ौफ़ इतना गहरा है कि वे आधी नींद के साथ पूरी उम्र निकाल देती हैं. बीबीसी ने हालिया घटना के बाद दिल्ली के चुनिंदा इलाक़ों में बेघर महिलाओं और बच्चियों से बात की. वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं. घटनास्थल से सटे हुए इलाक़े लाडो सराय में फ़ुटपाथ पर लोगों की एक पांत सजी हुई थी. कुछ महिलाएं गुब्बारे बेच रही थीं, कुछ फूल, तो कुछ मूर्तियां बना रही थीं. कुछ परिवार के साथ काम में लगी थीं. फ़ुटपाथ पर ही गद्दे बिछे हुए थे. लोहे की बाड़ पर कपड़े सूखते हुए. छोटी बेमेल डिब्बियों में राशन का सामान रखा हुआ. गर्मी में लू के थपेड़ों से बचने के लिए किसी-किसी ने स्टैंड फ़ैन लगा रखा था. गुब्बारे बेच रही एक महिला पूजा कहती हैं, "चाहे कितनी धूप हो या बारिश हो रही हो, दिन जैसे-तैसे गुज़र ही जाता है. असल मुश्किल रात में शुरू होती है." "बहुत लोग आस-पास से गुज़रते हैं. कोई भद्दी बात करता है, तो कई लोग पास ही बैठ जाते हैं. कभी कोई पास में लेट जाएगा. मना करो तो धमकाएगा कि फ़ुटपाथ क्या तुमने ख़रीद रखा है." पास ही पूजा के पति रौशन बैठे हुए हैं. जम्हाई लेते हुए वो कहते हैं, "छेड़खानी का क्या बताएं, बस ज़िंदा बचे हुए हैं. हमारा घर होता तो क्या घरवाली को खुले में रखते." फिर ख़ुद को कैसे सुरक्षित रखते हैं रात में? इस सवाल के जवाब में रौशन कहते हैं, "क्या करेंगे, दिन में नींद पूरी करते हैं, लेकिन रात तो रात है. झपकी आ ही जाती है. फिर वही होता है." पति-पत्नी राजस्थान के भीलवाड़ा से हैं. लगभग चार साल पहले दिल्ली आए. पूजा बताती हैं, "मेरी एक बेटी भी है, पहले उसे भी साथ लाए थे, लेकिन फिर ये सब देखा तो नानी के घर छोड़ना पड़ा. कम से कम वहां रहने को घर तो है." आप लोग भी घर क्यों नहीं लौट जाते? इसके जवाब में रौशन कहते हैं, "खेती-बाड़ी या कुछ दूसरा काम होता तो आते ही क्यों. चार साल से दिल्ली की सड़कों पर रह रहे हैं." "बीच-बीच में झुग्गी बनाने की कोशिश भी की, लेकिन पुलिस बार-बार तोड़ देती है. कहती है कि झुग्गी बनाते-बनाते एक दिन हम लोग रोड पर कब्ज़ा कर लेंगे." दोनों मिलकर रोज़ के दो सौ रुपये कमाते हैं. बहुत कमाई हुई तो तीन सौ रुपये आ जाएंगे. इसमें से कुछ से नए गुब्बारे खरीदते हैं. कुछ से रोज़ का खाना और बचे कुछ रुपये बेटी को भेजने के लिए जमा करते हैं. रौशन की कड़वी हंसी इस सवाल का जवाब थी. रेड लाइट के पास ही अपनी मौसी के साथ रहती रश्मि (नाम बदला हुआ) की तकलीफ़ सवाल का इंतज़ार नहीं करती. वो छूटते ही बोल पड़ती हैं, "अब तो छेड़खानी का हिसाब रखना बंद कर दिया. पहले मैं किनारे सोया करती थी. फिर कई बार ऐसा होने के बाद सारी औरतों ने कम उम्र की बच्चियों को बीच में सुलाना शुरू कर दिया. अगर कोई बहुत छोटी है, तो मां उसे अपने से चिपटाकर सोती है." वो कहती हैं, "लेकिन कितनी ही कोशिश कर लो, नींद आती है तो होश कहां रहता है. कुछ न कुछ हो ही जाता है. कितनी ही मांओं के बच्चे सोते-सोते में गायब हो गए." "दो-चार दिन रोए. पुलिस के पास गए तो ठीक से बता नहीं सके और लौटकर फिर वैसे ही रहने लगे." रश्मि की इस बात से मिलती-जुलती बात महिला अधिकारों पर काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना भी करती हैं. पीपल अगेंस्ट रेप्स इन इंडिया की संस्थापक योगिता दावा करती हैं, "कोई आधिकारिक स्टडी तो नहीं है, लेकिन सड़क पर रहने वालीं 10 में से 9 बच्चियां-महिलाएं यौन शोषण झेलती हैं." उनका कहना है, "एक बार, दो बार होते-होते ये उनके लिए इतना कॉमन हो जाता है कि इन हमलों को ज़िंदगी का हिस्सा ही मान लेती हैं. विरोध करना बंद कर देती हैं. यही वजह है कि कम ही घटनाएं रिपोर्ट होती हैं." भयाना कहती हैं, "महरौली वाली घटना एक्सट्रीम थी, इसलिए सुनाई पड़ गई, वरना आए-दिन बेघरों के साथ कुछ न कुछ हो रहा है." "लगभग तीन साल पहले मेरे पास एक महिला का मामला आया था. उसके साथ ब्रुटल गैंग रेप हुआ था. तीन महीने तक एम्स में रही. रिकवरी के बाद उसे हमने सेफ़ जगह दिलवाई थी और काम का भी बंदोबस्त किया था." वो कहती हैं, "बच्चियों की स्थिति और ख़राब है. माता-पिता सोए हैं. पास ही वो सोई हैं. कोई भी उठाकर ले जाएगा, कुछ पता नहीं लगेगा. लेकिन ये लोग शेल्टर में भी नहीं जाना चाहते." "सड़क पर रहते हैं तो गुज़रने वाले उन्हें खाना-कंबल दे जाते हैं. शेल्टर में सिर्फ छत होती है. इसलिए कई लोग विकल्प होते हुए भी सड़क पर ही बसे रहते हैं, जब तक कि कुछ बेहद एक्सट्रीम न हो जाए." महरौली में फ़ुटपाथ को घर बना चुकीं कौशल के पास बात करने का समय नहीं है. वो खाना बना रही हैं. फिर 'एक नींद' लेकर शाम को फूल बेचने निकलेंगी. बेटी गुब्बारे बेचेगी. वो कहती हैं, "जितने सदस्य, उतने काम बांट रखे हैं. तब जाकर रोटी लायक कमा सकेंगे." कड़ाही में चम्मच चला रही कौशल से जब बताया गया कि हम क्यों उनसे बात करना चाहते हैं तो वो तपाक से बोलती हैं, "जवान बेटी को लेकर सोती हूं, तो डर रहता है कि छोटे लड़के को कोई न उठा ले जाए. दिन में दो-तीन घंटा सोते हैं कि रात में थोड़ा 'अलर्ट' रह सकें." वो बताती हैं, "सोचो कि 24 घंटे सड़क पर रहना. गाड़ियों की आवाज़, लोगों की आवाज़, पुलिस के डंडे...ऐसे में नींद कहां पूरी होगी." "दिनभर आंखें ऐसे जलती रहती हैं जैसे नमक पड़ गया हो. सिर भन्नाता रहता है. पेट भले भर जाए, लेकिन नींद आधी ही रहती है. ऐसे एक-दो रोज़ नहीं, सोचो कि पूरी ज़िंदगी रहना है." सब्ज़ी बना रही कौशल के पास ग्राहक आ चुके थे. उन्हें प्लास्टिक का इनडोर स्विमिंग पूल ख़रीदना था. इशारे से वो कहती हैं कि इसमें हवा भरने में एकाध घंटा लग जाता है. ग्राहक आते हैं, देखकर चले जाते हैं. रात में अगर हवा न निकालो तो आते-जाते लोग सुई चुभा जाते हैं. उनके लिए यह मसखरी है. पास ही मूर्तियां बनाने वाला परिवार रहता है. वे तिरपाल के नीचे मूर्तियां रखते हैं और फ़ुटपाथ पर सोते हैं. इस परिवार की मुखिया हैं, मीरा. दरम्यानी उम्र की ये महिला ख़ुद को राजस्थान से बताती हैं. जवाब में मीरा कहती हैं, "यह नहीं पता. दादे-परदादे रहे होंगे. मेरी मां की पैदाइश यहीं की है. मैं भी इसी फ़ुटपाथ पर जन्मी. और मेरे बच्चे भी यहीं हुए." मीरा मुझे तिरपाल के नीचे ले गईं, जहां गणेश-दुर्गा की अधबनी मूर्तियां रखी हुई थीं. वह कहती हैं, "अभी सीज़न आ रहा है. रोज़ तीन मूर्तियां बन जाती हैं. कुछ बिकती हैं तो कुछ पड़ी रह जाती हैं." हंसते हुए मीरा कहती हैं, "यहां हाड़-मांस का इंसान खप जाता है, दिल्ली के इस मौसम में मिट्टी की मूर्तियां कहां टिकेंगी. वैसे भी पुलिस जब-तब तिरपाल भी हटा देती है." मीरा को महरौली की घटना पता है. वो बोलती हैं, "अपनी जवान-जहान बेटी को लेकर सड़क पर सोना, जंगल में रहने से ज़्यादा ख़तरनाक है." "वहां शेर आएगा, सांप आएगा. हो सकता है कि न भी आए. हो सकता है कि आए भी तो चुपचाप चला जाए, लेकिन यहां लोग आते हैं. कोई रात नहीं, जिसमें नींद से जागकर हम चिल्ला न पड़े हों." "कई बार हम पुलिस के पास भी जाते हैं. वे भी क्या करेंगे. कहते हैं कि घर पर जाकर रहो. अब किराए का घर कहां से लें. तीन हज़ार से पांच हज़ार तक किराया हो चुका है. इतना तो हम पूरे महीने में नहीं कमा पाते." "एकाध बार शेल्टर में गए थे, जब ठंड थी, लेकिन वहां भी अलग माहौल है. लोग आपस में लड़ते रहते हैं. फिर यहीं लौट आए." कुछ समय पहले शेल्टर में रहने गई लगभग 12 साल की एक बच्ची आव्या (नाम बदला हुआ) से भी हमारी मुलाकात हुई. सवाल सुनकर पहले तो वह चुप रहती हैं, फिर धीरे से कहती हैं, "होता है तो क्या करें. लड़की जात हैं, ये सब तो होगा ही. बस जितना हो सके, संभलकर रहते हैं." "पारी लगाकर सोते हैं. तीन घंटा एक सोती है, तीन घंटा दूसरी. मोबाइल देखते हुए रात बीत जाती है किसी तरह." 12 साल की आव्या से लेकर 50 के करीब पहुंच चुकी कौशल तक... सबकी एक ही कहानी है. वे चमचमाती राजधानी का वह पहलू हैं, जिसके दबे-ढंपे रहने में ही दिल्ली.. दिल्ली दिख सकेगी. बीबीसी ने महरौली मामले पर पुलिस अधिकारियों से भी बात करने की कोशिश की. दक्षिणी दिल्ली के डीसीपी अनंत मित्तल फोन पर कहते हैं, "जैसे ही हमें घटना की जानकारी मिली, हमने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी. कई टीमें बनाई गईं और खोजबीन होने लगी." वो बताते हैं, "सैकड़ों सीसीटीवी फुटेज देखे गए. यही वजह थी कि लगभग छह घंटों के भीतर अभियुक्त पकड़ा गया और एफआईआर हो गई. इसके साथ ही हमने प्रभावित परिवार की भी काउंसलिंग की और उसे सुरक्षित जगह पर पहुंचाया." इस सवाल पर कि क्या बेघरों, खासकर महिलाओं के लिए दिल्ली पुलिस कोई पहल कर रही है, डीसीपी कहते हैं, "बेघरों की सुरक्षा मल्टीपल एजेंसी अप्रोच है. इसमें पुलिस के अलावा भी कई प्रशासनिक विभाग मिलकर काम करते हैं. वही किया जा रहा है." डीसीपी अनंत मित्तल कहते हैं, "वैसे हमारी कोशिश रहती है कि हर इलाके में पेट्रोलिंग हो और लोगों पर नज़र बनी रहे. इसके अलावा हम लोगों को यह भरोसा दिलाने के प्रयास में है कि पुलिस उनके साथ है." "कुछ भी हो, वे बिना घबराए हमारे पास आ सकते हैं. फिलहाल हमने पेट्रोलिंग और बढ़ा दी है. बाकी कार्रवाई तो हो ही रही है." सोमवार तड़के अभियुक्त ने नाबालिग का उस वक्त अपहरण कर लिया, जब वह महरौली में फ़ुटपाथ पर अपने परिवार के साथ सोई हुई थी. दक्षिणी दिल्ली के डीसीपी अनंत मित्तल के मुताबिक सूचना मिलने पर एक्शन लिया गया और कुछ घंटों के भीतर संदिग्ध पकड़ा गया. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक पेशे से कैब ड्राइवर रहे अभियुक्त ने बच्ची की किडनैपिंग, रेप ­और हत्या की बात स्वीकार की है. पुलिस के एक अधिकारी ने नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर बताया कि अभियुक्त को 25 जून को अदालत में पेश किया गया था. वहां दिल्ली पुलिस ने पूछताछ के लिए कुछ और दिन की रिमांड ले ली. मंगलवार को अदालत में पेश किए जाने के बाद अभियुक्त को दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया. रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस का दावा है कि घटनास्थल पर ले जाते समय अभियुक्त ने एक पुलिसकर्मी की सरकारी रिवॉल्वर छीनने की कोशिश की और पुलिस टीम पर गोली चला दी. जवाबी कार्रवाई में पुलिस की गोली अभियुक्त के पैर में लगी. इसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया. पुलिस ने अभियुक्त के ख़िलाफ़ पुलिसकर्मी पर हमला करने का एक अलग मामला भी दर्ज किया है. बीबीसी ने इस मामले पर सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर राजेश कुमार से भी बात की. वो लगभग चार दशक से नशा मुक्ति और बेघरों पर काम कर रहे हैं. राजेश का कहना है, "बेघरों में भी महिलाओं से ज़्यादा असुरक्षित कोई नहीं. बच्चियां इसमें भी एक्सट्रीम झेलती हैं. वे सोते में ही उठा ली जाती हैं और रेप-हत्या जैसे अपराध का शिकार हो जाती हैं." "कई बार वे बेच दी जाती हैं. महरौली वाला केस आइसोलेटेड नहीं है, ऐसा होता रहता है, बस रिपोर्ट नहीं होता." वह कहते हैं, "माता-पिता को इसकी जानकारी नहीं कि कुछ हो जाए तो क्या करना है, पुलिस के पास कैसे जाना है और कैसे रिपोर्ट करवानी है." "बेघर अगर माइनर हो और परिवार से अलग दिखे तो उसे रिपोर्ट करने की भी अलग प्रोसेस है. अगर पेट्रोलिंग दस्ते को पता लगे कि कोई सड़क पर अकेली है तो तुरंत उसे शेल्टर पर पहुंचाया जाना चाहिए. अगले 24 घंटों के भीतर बच्ची या बच्चे को चाइल्ड वेलफ़ेयर कमेटी के आगे ले जाया जाता है." "नाबालिग चाहे पुलिस को मिले, या एनजीओ को, इसकी प्रक्रिया यही है. लोगों को पता नहीं होता और माइनर तमाम नर्क देख लेता है." वह आगे कहते हैं, "एक समस्या यह भी है कि दिल्ली में बेघर बढ़ रहे हैं, लेकिन उस हिसाब से शेल्टर कम हैं. कितने लोगों के पास घर नहीं है और मौजूदा शेल्टर होम्स की कितनी क्षमता है, इसे रीअसेस करने की ज़रूरत है." दिल्ली अर्बन शेल्टर इंप्रूवमेंट बोर्ड के डेटा के मुताबिक, इस वक्त दिल्ली में लगभग दो सौ शेल्टर हैं, जो स्थाई हैं. कुछ शेल्टर एम्स के पास हैं, जो गर्मियों के बाद बंद कर दिए जाएंगे. बोर्ड के मुताबिक कुल शेल्टर्स में 155 होम पुरुषों के लिए हैं. परिवार के लिए 20 शेल्टर हैं, जबकि महिलाओं के लिए 17 शेल्टर ही आरक्षित हैं. इसके अलावा कुछ रिकवरी और ड्रग डीएडिक्शन शेल्टर भी हैं, जो एक ख़ास मकसद के लिए हैं. अब लौटते हैं पुराने सवाल पर कि राजधानी में बेघर आबादी कितनी है. दिल्ली में बेघर लोगों के साथ काम करने वाले कई सामाजिक संगठनों के एक फ़ोरम शहरी अधिकार मंच ने अगस्त 2024 में पांच रातों तक एक हेडकाउंट (लोगों की गिनती) किया था. इसमें डेढ़ लाख से ज़्यादा लोग सड़कों पर मिले. कई इलाकों में पहुंच न होने के कारण बड़ी संख्या में लोग छूट गए. यह मानते हुए फ़ोरम ने अनुमान लगाया कि राजधानी में बेघरों की संख्या 3 लाख से ज़्यादा हो सकती है. बाद में इस पर प्रेस नोट भी जारी हुआ, जिसके मुताबिक दिल्ली की स्टेट लेवल शेल्टर मॉनिटरिंग कमेटी, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी समिति है, उसने भी इस हेडकाउंट को समर्थन दिया था. बेघरों से मुलाकात के बीच बीबीसी महरौली के उस इलाके में भी पहुंची, जहां सोमवार तड़के नाबालिग के साथ क्रूरता हुई थी. फ़ुटपाथ पर सोने वाले परिवार वहां से हटाए जा चुके थे. पीछे कुछ भी नहीं बचा था... न उनके होने का कोई निशान, न उनके उजड़ जाने का कोई सबूत. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi

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