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'एटीएम में एसी लगाए पर चुरा लिया ग़रीबों का पानी' मोहम्मद हनीफ़ का ब्लॉग

✍️ Admin 📅 30 June, 2026 ⏰ 03:32 PM 👁 19 views

इमेज स्रोत, Rizwan TABASSUM / AFP via Getty Images गर्मी हर साल आती है और हर साल एक ही शोर होता है कि 'क़हर ख़ुदा का! भाई, इतनी गर्मी हमने पहले भी नहीं देखी.' हर साल तापमान के रिकॉर्ड भी टूटते रहते हैं. जहाँ कभी 40-42 डिग्री सेल्सियस पर क़यामत जैसा लगता था. वहीं, अब तापमान 50-52 तक पहुँच जाता है. शहरों में जो रईस लोग हैं, वे अपने एसी वाले ठंडे घरों से निकलकर, ठंडी कार में बैठकर, ठंडे ऑफिस में पहुँच जाते हैं. उनके हाथ में मिनरल वॉटर की ठंडी बोतल होती है. बाकी जो ग़रीब और मज़दूर हैं, वे कड़कती धूप में भी शहर की सड़कों पर या बसों में या रिक्शों पर, बस सिर पर एक कपड़ा बांधकर अपने-अपने काम में लगे रहते हैं. बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें बड़े शहरों में अब मीलों तक पैदल चलते चलें, तो आपको कहीं भी वॉटर कूलर या पानी का नल नहीं मिलेगा. जिस आदमी को दिनभर मजदूरी करके 500-700 रुपये कमाने हैं, वो 50 रुपये की आधा लीटर मिनरल वॉटर की बोतल कहां से खरीदेगा? वैज्ञानिकों की बात मानें या न मानें, आपका अपना शरीर आपको बताता है कि क्लाइमेट चेंज अब हो रहा है. अगर आप अमीर या मिडिल क्लास इंसान हैं, तो भले ही आप बिजली के बिल की शिक़ायत करते रहें, आपका टेम्परेचर 20 से 22 डिग्री ही रहता है और अगर आप एक मज़दूर हैं तो आप जाने और क्लाइमेट चेंज जाने. इमेज स्रोत, Sanchit Khanna/Hindustan Times via Getty Images क़ुदरत ने गर्मी से राहत के लिए दो तरीक़े बनाए हैं, एक- पेड़ों की छाँव और दूसरा- पानी. पेड़ हम काट-काटकर उनकी जगह सीमेंट, कांच और सरिए की इमारतें बनाते जा रहे हैं. पानी, क़ुदरत ने मुफ़्त दिया था, हम उसे भी लोगों से चुराकर प्लास्टिक की बोतलों में बंद करके, फिर फ़्रिज़ में रखकर बेच रहे हैं. गांवों को रोमांटिसाइज़ करने वाले लोग मुझे कभी भी पसंद नहीं आए, लेकिन जो वहां मिट्टी के घर होते थे वे गर्मी से बचाते थे और सर्दियों में गर्म रखते थे. लेकिन ग़रीबी ख़त्म करने का पहला क़दम यह होता है कि सीमेंट और सरिए से घर को पक्का करना. फिर उस घर को गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म रखने के लिए गैस और बिजली के बिल भरें. इसी का नाम तरक्क़ी है. इमेज स्रोत, Rizwan TABASSUM / AFP via Getty Images) वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं. जिसे ज़्यादा तरक्की करनी है या जो चार क्लास पढ़ जाता है, वह रोशनियों की ओर भागता है, यहां काम भी बहुत है. मैंने भी गांवों में घरों को मिट्टी से सीमेंट का बनता हुआ देखा है. पंखे और एसी आते देखे हैं. ग़रीब आदमी तब पेड़ की छांव में चारपाई बिछाकर कच्ची लस्सी पीकर गर्मियां गुज़ार लेता था. फिर हम क़राची पहुंच गए. वहां बड़े शहर की सारी सुविधाएं उपलब्ध थीं, काम भी मिला और प्यार भी मिला. मेरे जैसे हज़ारों और लोग रोज़ाना कराची पहुँचते थे और अब भी पहुँचते हैं. मैंने एक समझदार आदमी से पूछा कि अगर कोई व्यक्ति पेशावर के किसी गांव से चलता है तो वह सीधे कराची में आकर ही क्यों रुकता है ? उन्होंने समझाया कि इसका एक कारण मौसम भी है. कराची समुद्र के किनारे है. यह एकमात्र ऐसा शहर है, जहाँ साल के बारह महीने इंसान खुले आसमान के नीचे सो सकता है. गर्मी और सर्दी परेशान तो करेगी, यहां इंसान आपका दुश्मन हो सकता है, लेकिन मौसम आपको नहीं मारेगा. फिर 2015 में गर्मियां आईं, हीटवेव आई. अल्लाह का क़हर, एक हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान चली गई. सड़कों पर चलते हुए, इमारतों और फैक्ट्रियों में काम करते हुए और कंक्रीट की बनी अपनी झोपड़ियों में बैठे-बैठे लोग मरते रहे. इससे पहले हम एक बात सुनते थे कि 'यहां कोई भूखा नहीं सोता', लेकिन वह भी झूठ था. फिर ये बात कि 'मौसम किसी को नहीं मारता', यह बात भी झूठ निकली. इमेज स्रोत, Qamar Sibtain/The India Today Group via Getty Images 2015 की हीटवेव के दौरान मैं एक बैंक के एटीएम पर गया. आपने भी देखा होगा उसे जो एक छोटा सा कमरा होता है. उस कमरे में एक पूरा परिवार, 2-3 औरतें, 5-7 बच्चे, गर्मी से बचने के लिए एक-दूसरे से सटकर बैठे हुए थे क्योंकि एटीएम रूम में एसी लगा होता है. असली क़हर ख़ुदा का यह है कि हमने नोट मशीन को ठंडा रखने के लिए एसी लगा लिए हैं और मज़दूरों से पेड़ों की छाँव भी छीन ली है और उनका पानी भी चुरा लिया है. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

स्रोत: BBC Hindi

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