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जंतर-मंतर का आंदोलन क्या सीजेपी और सोनम वांगचुक से बड़ा हो चुका है?- ग्राउंड रिपोर्ट

✍️ Admin 📅 25 July, 2026 ⏰ 07:21 AM 👁 40 views

जंतर-मंतर पर बैरिकेड से ठीक पहले एक परिवार ठंडी लस्सी और छाछ का पैकेट बाँट रहा है. मीनू फोगाट अपनी 18 साल की बेटी और पति के साथ बीते कई दिनों से यहाँ आ रही हैं और कहती हैं कि पहली बार वो किसी प्रदर्शन में शामिल हुई हैं. वो कहती हैं, "हमारा बेटा आईआईटी में है लेकिन हम यहाँ सभी बच्चों की लड़ाई में शामिल होने आए हैं. बस फोन पर रील शेयर करने से काम नहीं चलेगा, हमें घरों से बाहर निकलना होगा." मीनू फोगाट के पति उत्तरी दिल्ली में एक मिठाई की दुकान चलाते हैं. बीते कुछ दिनों से वहाँ काम करने वालों के भरोसे दुकान छोड़ कर पूरा परिवार जंतर मंतर पर आ रहा है. मेरी तरफ़ लस्सी के 200 ग्राम का एक पैकेट बढ़ाते हुए वह कहती हैं, "आप भी ले लीजिए गर्मी बहुत है." 21 जुलाई को जब मैं जंतर मंतर पहुंची तो ये पहली चीज़ थी, जिससे मेरा सामना हुआ और कई मायनों में इससे पूरे मूवमेंट का एक व्यापक फ्रेम सामने आ जाता है. आम लोग जिन्होंने कभी आंदोलन क़रीब से नहीं देखा, सिर्फ़ न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में आंदोलन देखा और सुना, आज वे एक दूसरे का सपोर्ट सिस्टम बने आंदोलन में खड़े हैं. जंतर मंतर जो संसद से कुछ मीटर की दूरी पर है, अब नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के सबसे बड़े चैलेंज का ठिकाना बन चुका है. इन सबके केंद्र में रही है कॉकरोच जनता पार्टी. इसके अलवा 26 दिनों तक भूख हड़ताल करने वाले समाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक. कॉकरोच जनता पार्टी कैसे अस्तिव में आई, ये सारी जानकारी आप पहले ही कई बार सुन और पढ़ चुके हैं. यहाँ इस समय हज़ारों की संख्या में लोग जुट रहे हैं, उनकी मांग काग़ज़ों पर प्रिंट हो कर प्ले कार्ड की शक्ल में और नारों की शक्ल में गूंज रही है, और वो मांग है- "धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दो." लेकिन इस हफ़्ते जो कुछ भी हुआ है, उसने इस प्रदर्शन की कोर मांग, उसे लेकर अनशन और अनशन जिस मोड़ पर और जिस तरह ख़त्म हुआ ये सब एक दूसरे से अलग दिख रहे हैं. क्या कहा गया, कैसे ये आंदोलन तेज़ी पकड़ा और अभी क्या हो रहा है, इन सबके बीच एक फासला नज़र आता है और इस वक़्त ये प्रदर्शन इन अलग-अलग वर्जन के बीच राह तलाशता दिख रहा है. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. सोनम वांगचुक ने गुरुवार आधी रात स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह के हाथों अपना 26 दिनों का अनशन तोड़ा. उन्होंने सरकार के जिन आश्वासन पर ये अनशन तोड़ा वे कुछ यूं हैं- सरकार शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे लोगों पर एफ़आईआर दर्ज नहीं करेगी. सरकार नीट पेपर लीक और एजुकेशन सिस्टम को बेहतर बनाने के समाधान के लिए संसद में चर्चा करेगी. और नीट पेपर लीक को लेकर जिन छात्रों ने ख़ुदकुशी की है, उनके परिवार वालों को उचित मुआवज़ा दिया जाएगा. अब बात उन मांगों की, जिसे लेकर ये प्रदर्शन और अनशन लगभग एक महीने पहले शुरू हुआ था. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें. नीट पेपर लीक में जिन बच्चों ने आत्महत्या की है, उनके परिवार को एक करोड़ मुआवज़ा मिले. सीजेपी की इन्हीं मांगों को समर्थन देने 28 जून से सोनम वांगचुक सीजेपी के मंच पर अनशन के लिए बैठे. तब अपने एक इंटरव्यू में वांगचुक से पूछा गया था कि एक व्यक्ति के इस्तीफ़े से क्या बदल जाएगा, जिसके जवाब में उन्होंने कहा था, "इससे जवाबदेही तय होगी." वांगचुक के अनशन तोड़ने पर मुझसे सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने कहा, "हम चाहते थे कि वे अनशन तोड़ें. हम ये साफ़ कह चुके हैं कि प्रदर्शन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े तक चलेगा." सीजेपी के मंच पर किनारे खड़े अमरदीप (बदला हुआ नाम) का काम किसी शख्स को मंच के सामने जाने से रोकने का है. ये सीजेपी की कोर वॉलेंटीयर्स की टीम है, जो मंच के आसपास की व्यवस्था को पुख्ता करने का काम करती है. मंच की तरफ़ मुझे आता देख वो मुझे रोकने के लिए हाथ बढ़ाते हैं, लेकिन कुछ सेकेंड में ही जब उन्हें ये अंदाज़ा हो जाता है कि मैं आगे नहीं बढ़ रही तो वो अपना हाथ खींच लेते हैं. अमरदीप मध्य प्रदेश से दिल्ली इस प्रदर्शन के लिए आए है. वह एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में शिक्षक हैं और छुट्टी लेकर यहाँ आंदोलन का हिस्सा बनने आए हैं. वह कहते हैं, "आख़िर वो उपवास कब तक रख सकते थे, तोड़ना तो था ही. हाँ जिस तरह तोड़ा वो ठीक नहीं लग रहा है." लेकिन इसके साथ ही वो प्रदर्शन की दिशा को लेकर भी अनिश्चित दिखते हैं. वो कहते हैं, "अभी समझ में बहुत कुछ नहीं आ रहा है. ये लोग तो कह रहे हैं कि इस्तीफ़े तक चलेगा, लेकिन क्या पता आगे क्या होने वाला है." दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और देश के जाने-माने पब्लिक इंटलेक्चुअल अपूर्वानंद कहते हैं, "जब सोनम वांगचुक ने अनशन शुरू किया तो लोग उनकों संत की तरह देख रहे थे, लोग उनके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस करने लगे, उनके भूखे रहने के कष्ट को लोगों ने देखा लेकिन वो अपने ही वादे पर टिके नहीं रह सके.'' ''बीते कुछ दिनों में उन्होंने शर्तें बदली हैं. वो अब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा नहीं मांग रहे हैं लेकिन जंतर मंतर पर सीजेपी अब भी इस्तीफ़े की मांग कर रही है. तो सवाल ये उठता है कि क्या वांगचुक सीजेपी से बात कर भी रहे हैं. वांगचुक ने ख़ुद ही अनशन पर बैठने का फ़ैसला किया है तो उन्हें अपना अनशन तोड़ने के लिए किसी की इज़ाज़त की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए." "उनकी मांगें तभी बदल गई थीं जब उनसे एनडीए के मंत्रियों से मुलाक़ात हुई थी, तभी से उनकी मांगों में शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग ग़ायब हो गई थी. उन्हें ये समझना होगा कि ये मूवमेंट उनसे कहीं ज़्यादा बड़ा है, ये ज़रूर है कि उन्होंने एक अहम भूमिका निभाई है, उनके अनशन ने एक भूमिका निभाई है.'' हालांकि सोनम वांगचुक ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग नहीं छोड़ी है. बीते शनिवार यानी 18 जून को जब सोनम वांगचुक को उठाया गया तो उसके बाद अभिजीत दीपके ने एलान किया कि वो अब अनशन पर बैठ रहे हैं. 20 जुलाई को उन्होंने मंच से एलान कर दिया कि वह अपना अनशन तोड़ रहे हैं. 22 जुलाई को जब मैं जंतर मंतर पर थी तो अभिजीत दीपके ने कहा कि अब बात प्रधान के इस्तीफ़े से बढ़ कर प्रधानमंत्री के इस्तीफ़े तक पहुंच गई है. लेकिन मंच से उनके इस एलान में कोई गंभीरता नहीं थी. मोहित जो सीजेपी वॉलंटियर हैं, वो कहते हैं, "दीपके सर ने अनशन तोड़ा क्योंकि वो नहीं कर पा रहे थे और उनको मार्च में हिस्सा लेना था." मोहित 32 साल के हैं और आंदोलन की शुरूआत से जंतर-मंतर आ रहे हैं. वो कई प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठ चुके हैं. हाल ही में वो पुलिस भर्ती परीक्षा में मेडिकल कारणों से अपना फिज़िकल टेस्ट नहीं दे पाए. मोहित मानते हैं कि ये आंदोलन एक ज़रूरी मांग के लिए हैं लेकिन वो ये भी मानते हैं कि आंदोलन को लेकर और तैयारी होनी चाहिए. कई आंदोलनों के हिस्सा रहे योगेंद्र यादव इस आंदोलन को "नॉन सीरियस" तो नहीं कहते लेकिन वो ये ज़रूर मानते हैं कि सीजेपी की लीडरशिप में अपरिपक्वता है. योगेंद्र यादव कहते हैं, "ये कम उम्र के लोग हैं, जिनके पास तजुर्बे की कमी है, उस तजुर्बे की कमी में ये लोग ऐसी बात कर देते हैं जो नॉन सीरियस लग सकती हैं.'' ''अगर इनमें आंदोलन को लेकर गंभीरता नहीं होती तो ये 20 जुलाई को इतना कुछ होने के बाद जंतर मंतर पर वापस नहीं आते. जो कुछ भी इस तरह की चीज़ें हो रही हैं, मैं उसे समझ की कमी के तौर पर देख रहा हूँ.'' ''सोनम वांगचुक के अनशन के बाद पीछे हट सकते थे लेकिन उन्होंने प्रधान के इस्तीफ़े मांग जारी रखने की बात कही है. देखिए मुझे लगता है कि ये प्रदर्शन अब वांगचुक या सीजेपी तक सीमित नहीं है, इस समय देश का युवा कुछ कहना चाह रहा है और वो सबसे ज़रूरी बात है." एक ख़ास बात ये है, जिसका ज़िक्र उतना होता नहीं दिख रहा, जितना होना चाहिए. इस प्रदर्शन में शुरुआत से छात्र संगठन जुड़े हुए हैं. वो भले मंच पर अनशन पर नहीं बैठे लेकिन मंच के किनारे अनशन पर बैठे रहे. ऑल इंडिया स्टूडेंट असोसिएशन यानी आइसा जो सीपीआई (एमएल) की छात्र शाखा है, इसके तीन छात्रों ने 23 दिनों तक अनशन किया" नेहा उनमें से एक है. मैंने नेहा से पूछा कि क्या सीजेपी की रणनीति में आइसा भी शामिल है, क्या इस प्रदर्शन में उनकी राय रणनीति तैयार करते समय ली जा रही है? इसके जवाब में नेहा कहती हैं, "हां हम अपनी राय सामने रखते हैं, हमें मीटिंग में बुलाया जाता है." लेकिन क्या 20 जुलाई को मार्च के दौरान सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका ने जेपी नड्डा से मुलाक़ात की जानकारी नेहा या उनके संगठन के किसी भी सदस्य को दी गई? इसका जवाब देते हुए वो कहती हैं, "नहीं, हमें उस मुलाक़ात के बारे में मीडिया से पता चला." जिस समय जंतर-मंतर पर आइसा के बूथ पर बैठ कर नेहा हमसे बात कर रही थीं, उस समय उनके एक साथी सीजेपी की बैठक में शामिल होने गए थे. अपूर्वानंद कहते हैं, "आपने अपनी क्षमता से बड़ा काम अपने ज़िम्मे उठा लिया है. मुझे लगता है अभिजीत दीपके में परिपक्वता की कमी है. 20 जुलाई को उस लीडरशिप की कमी हमें नज़र आई. प्रदर्शनकारियों को लीड करने वाला कोई नहीं था, कई प्रदर्शनाकरी मुझे भी बता रहे थे कि ये लीडर उन्हें कहीं नज़र नहीं आए मार्च में.'' ''मार्च कर रहे लोगों को उनके हाल पर छोड़ा गया लेकिन लोगों ने उन्हें माफ़ कर दिया. ये बात तो है कि जब आप इस तरह के मार्च का आह्वान करते हैं तो आपको प्लान करना पड़ता है, एक रणनीति बनानी होती है लोगों के उससे अवगत कराना होता." आलोक कुमार वर्मा लखनऊ से 21 जुलाई को जंतर मंतर पहुँचे हैं. वह ख़ुद एसएससी की तैयारी करते हैं और कहते हैं कि अपने छोटे भाई के लिए यहाँ आए हैं, जो एक नीट अभ्यर्थी हैं. इस आंदोलन को अब वो कैसे देख रहे हैं? आलोक इसके जवाब में कहते हैं, "सरकार की ओर से देरी पर देरी की जाएगी, फिर हम थकने लगेंगे और शायद यहां ना आ पाएं तो ये आंदोलन ख़ुद कम होने लगेगा. ट्रेंने घंटों की देरी से चलाई जा रही हैं, ग़ाज़ियाबाद में पांच घंटे ट्रेन रुकी रही. दो दिन मुझे हो गए, फोन चार्ज करना है, नहाना है तो होटल लेना पड़ रहा है और इसका असर तो जेब पर पड़ ही रहा है. मुझे लगता है कि इतना वक़्त लगाया जाएगा कि लोग ख़ुद घरों को लौटने लगें." ये सिर्फ़ आलोक की ही बात नहीं है, वंदना जो मेरठ से आंदोलन में आई हैं, वो भी यही कहती हैं कि "खाना तो मिल रहा है लेकिन बाथरूम तो चाहिए ही. मैं जितना सोच कर आई थी, उससे कहीं ज़्यादा पैसे खर्च कर चुकी हूं. मुझे अब एक दो दिन में वापस जाना पड़ेगा." आने वाले दिनों में ये आंदोलन किस सूरत में दिखेगा ये अंदाज़ा लगा पाना अभी मुश्किल है, ख़ास कर तब हर पल एक नया एक्शन सामने आ रहा है. सीजेपी और सरकार के बीच इस वीकेंड पर होने वाली दूसरे राउंड की बातचीत से क्या बदलेगा इसका जवाब ना तो बैरिकेड पर खड़े लोगों के पास है और ना ही इस आंदोलन को देखने और समझने वालों के पास है. इस आंदोलन का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है लेकिन केंद्र सरकार एक पक्ष से बात कर रही है. सरकार कुछ वादे कर रही है. प्रधानमंत्री मोदी ने एक वीडियो पोस्ट कर ऐसा कहा भी. शाम के साढ़े छह बज चुके हैं, जंतर-मंतर पर भीड़ इतनी है कि संकरे गेट से बाहर निकल पाना ख़ुद में एक जीत जैसा लगता है. पैदल केरल हाउस की ओर बढ़ते हुए मेरी मुलाक़ात एम्स की डॉक्टर श्रुति से हुई, वो वॉकर लेकर प्रदर्शन में आई थीं. मैंने उनसे पूछ लिया इतनी मुश्किलों के साथ आप क्यों आईं? श्रुति कहती हैं, "20 जुलाई को पुलिस ने मेरे पैरों पर मारा तो अब वॉकर से चलना पड़ रहा है लेकिन मुझे यहाँ आना था. हर उन बच्चों के लिए जो जीवन में कुछ अच्छा करना चाहते हैं." यही इस आंदोलन की ख़ूबसूरती है, यहाँ लोग एक दूसरे की ताक़त बन रहे हैं. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi

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