ट्रंप के नए झटके से क्या भारत की मुश्किलें और बढ़ेंगी
इमेज स्रोत, Kevin Dietsch/Getty Images अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को भारत समेत लगभग 60 देशों पर 10 से 12.5 फ़ीसदी का टैरिफ़ लगाने का एलान किया है. भारत को दस फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ देना होगा. ट्रंप प्रशासन का कहना है कि ये देश अमेरिका को उन सामानों का निर्यात कर रहे हैं, जो जबरन मज़दूरी करवाकर बनाए गए हैं. ट्रंप प्रशासन इसे मानवाधिकार हनन का मामला मान रहा है. इसी हफ़्ते ट्रंप ने जेनेरिक दवाओं के आयात पर 2028 से 100 फ़ीसदी और आगे जाकर 200 फ़ीसदी तक टैरिफ़ लगाने की मंशा भी जता दी. इससे भारत की फ़ार्मा कंपनियों में चिंता की लहर है क्योंकि भारत अमेरिकी बाज़ार को जेनेरिक दवाई सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा सप्लायर है. इमेज स्रोत, Kevin Carter/Getty Images ट्रंप के नए टैरिफ़ पर भारत ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया तो नहीं दी है. लेकिन इंटरनेशनल ट्रेड एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति का ये फ़ैसला सही नहीं है. भारत के थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के फ़ाउंडर अजय श्रीवास्तव ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहा, ''ट्रंप के इस तर्क में दम नहीं है कि भारत में जबरन मजदूरी कराकर बनाए गए सामानों को अमेरिका भेजा जा रहा है. अभी तक अमेरिका ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया है, जिससे ये साबित हो कि भारत से निर्यात होने वाले सामान जबरन मजदूरी कराकर बनाए जा रहे हैं. भारत में जबरन मज़दूरी पर प्रतिबंध है.'' अंतरराष्ट्रीय मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ कांति वाजपेयी ने टैरिफ़ के एलान के बाद इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने लेख में लिखा कि भारत के पास 1991 जैसा समय लौट आया है. लेकिन इस बार हालात और ख़राब हैं. 1991 के ठीक पहले भारत भारी भुगतान संतुलन से जूझ रहा था. इस स्थिति से निकलने के लिए उसे कड़े आर्थिक सुधार लागू करने पड़े थे. कांति वाजपेयी ने लिखा है कि साल 1991 शीत युद्ध का अंत भी था. भारत के लिए यह एक बड़ा झटका था कि सोवियत संघ के पतन के साथ ही चीन और अमेरिका के विरुद्ध उसकी सुरक्षा कवच भी समाप्त हो गई. चीन ने भी अमेरिका के नए टैरिफ़ का विरोध किया है और कहा है कि उसके यहां 'जबरन मजदूरी' जैसी कोई चीज़ नहीं है. इस तरह का एकतरफ़ा टैरिफ़ लगा कर राजनीतिक दुश्मनी निकाली जा रही है. ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और ब्राज़ील समेत कई देशों ने ट्रंप के नए टैरिफ़ की आलोचना की है. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. इस बीच, सबसे ज़्यादा चिंता भारत के फ़ार्मा सेक्टर में है, जो दुनिया की सबसे बड़े जेनेरिक दवा सप्लायर है. ट्रंप ने जब से ट्रुथ सोशल पर अमेरिका में जेनेरिक दवा सप्लायर पर पहले 100 और बाद में 200 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाने की मंशा जताई है. तब से भारतीय दवा कंपनियों के बीच अपने कारोबार को होने वाले नुक़सान की आशंकाएं बढ़ गई हैं. ट्रंप ने 21 जुलाई को ट्रुथ सोशल पर एलान किया था कि दो वर्षों तक आयातित जेनेरिक दवाओं पर कोई टैरिफ़ नहीं लगेगा. इस अवधि में कंपनियों को अपना उत्पादन अमेरिका में करने का इंतजाम करने का मौक़ा मिल जाएगा. लेकिन अगस्त 2028 से एक वर्ष के लिए 100 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया जाएगा और अगस्त 2029 से इसे बढ़ाकर 200 फीसदी कर दिया जाएगा. इसके बाद से ही भारतीय दवा कंपनियों के बीच अपने क़ारोबार को होने वाले नुक़सान की आशंकाएं बढ़ गई हैं. ट्रंप की मंशा सामने आने के बाद भारतीय दवा कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई. भारत को अक्सर "दुनिया की फार्मेसी" कहा जाता है. अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली लगभग आधी जेनेरिक दवाएं भारत से आती हैं. अमेरिकी फूड एंड ड्रग्स एडिमिनिस्ट्रेशन यानी एफ़डीए के मुताबिक़ अमेरिका में लिखी जाने वाली 90 फ़ीसदी से अधिक दवाओं की पर्चियां जेनेरिक दवाओं की होती हैं. इन दवाओं में वही मटीरियल होते हैं जो ब्रैंडेड दवाओं में होते हैं, लेकिन उनकी क़ीमत काफ़ी कम होती है. इनमें से लगभग 70 फ़ीसदी दवाएं विदेश से आती हैं. साल 2025 में भारत ने कुल ढाई लाख करोड़ रुपये की दवाओं का निर्यात किया था, जिसमें से 93, 670 करोड़ की दवाइयां अमेरिका गईं. इन निर्यातों में पेटेंट अवधि समाप्त हो चुकी कम क़ीमत वाली दवाएं शामिल हैं, जैसे दर्द निवारक, एंटीबायोटिक और कैंसर की दवाएं. जेनेरिक दवाओं के मामले में स्थिति अधिक जटिल है, क्योंकि इनमें मुनाफ़े का मार्जिन कम होता है और इनका प्रोडक्शन ग्लोबल सप्लाई चेन पर निर्भर करता है. अभी ये साफ़ नहीं है कि टैरिफ़ सिर्फ़ तैयार दवाओं पर लगेगा या फिर उनके बनाने में इस्तेमाल होने वाले एपीआई (कच्चे माल) पर. चीन दुनिया का सबसे बड़ा एपीआई सप्लायर है. अगर टैरिफ़ केवल तैयार दवाओं पर लगाया गया, तो कंपनियां अमेरिका में बाहर से आने वाले एपीआई का इस्तेमाल कर सकती हैं. लेकिन एपीआई पर भी टैरिफ़ लगा तो कंपनियों के उत्पादन की लागत काफ़ी बढ़ जाएगी और इसका बोझ सबसे ज़्यादा उपभोक्ताओं पर पड़ेगा. विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति में बहुत कम भारतीय कंपनियां बाज़ार में टिक सकेंगीं. भारतीय इन्वेस्टमेंट कंपनी में पीएमएस इन्वेस्टमेंट फंड मैनेजर अनिरुद्ध गर्ग ने सीएनए से कहा, ''ये देखना होगा कि किन कंपनियों के पास इतनी मज़बूत वित्तीय स्थिति है कि वो 'रीशोरिंग' की प्रक्रिया में टिक पाएंगीं. ज़्यादातर भारतीय फ़ार्मा कंपनियों के पास इतना पैसा नहीं है कि वो इस प्रतिस्पर्द्धा में टिक सकें. " रीशोरिंग का मतलब उसी देश में उत्पादन करना है, जहां के उपभोक्ताओं के लिए माल बनाया जा रहा है. चिंता सिर्फ़ भारतीय फार्मा कंपनियों में ही नहीं हैं बल्कि ये अमेरिकी दवा उपभोक्ता और बाज़ार को भी परेशान कर रही है. अमेरिकी दवा बाज़ार के विशेषज्ञ ने टाइम मैगजीन से बातचीत में कहा, "अमेरिका में बिकने वाली दवाओं का 90 फ़ीसदी हिस्सा जेनेरिक दवाओं का है. इसलिए इन टैरिफ़ का असर बहुत व्यापक होगा." अमेरिका में पेशेंट्स फॉर अफर्डोबल ड्रग्स की सीईओ मेरिथ बेसी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा कि "जेनेरिक दवाओं पर भारी टैरिफ़ लगाने से सस्ती दवाएं महंगी हो जाएंगी. साथ ही ये इनकी सप्लाई भी कम हो जाएगी. लाखों अमेरिकी इन दवाओं पर निर्भर हैं.'' " विशेषज्ञों का मानना है कि बहुत ज़्यादा टैरिफ़ लगा तो कुछ फ़ार्मा कंपनियां मार्केट से बाहर निकल गए तो अमेरिका में जेनेरिक दवाओं की कमी भी हो सकती है. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi