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मनमोहन सिंह हुए 'बेदाग़', क्या था 'कोयला घोटाला' मामला जिसमें तत्कालीन पीएम को किया गया था तलब

✍️ Admin 📅 29 July, 2026 ⏰ 07:00 PM 👁 56 views

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले को बंद कर दिया और उन्हें समन जारी करने के आदेश को रद्द कर दिया. मनमोहन सिंह का 27 दिसंबर 2024 को निधन हो गया था और अब वो इस चर्चित आपराधिक मामले में औपचारिक रूप से दोषमुक्त हो गए हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने सीबीआई की क्लोज़र रिपोर्ट स्वीकार कर ली, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री और अन्य अभियुक्तों को क्लीन चिट दी गई है. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से माफ़ी की मांग की है. हालांकि अब तक इस मामले पर बीजेपी की ओर से कोई बयान सामने नहीं आया है. यह मामला ओडिशा के तालाबीरा-2 कोयला ब्लॉक को साल 2005 में एम/एस हिंडाल्को को आवंटित किए जाने से जुड़ा है. उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास ही कोयला मंत्रालय का प्रभार था. कथित कोयला घोटाला मामले में तालाबीरा-2 कोयला ब्लॉक आवंटन को लेकर साल 2015 में उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला, पूर्व कोयला सचिव पीसी पारख और तीन अन्य के साथ मनमोहन सिंह को भी सीबीआई की विशेष अदालत ने अभियुक्त के रूप में तलब किया था. हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी थी. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. मनमोहन सिंह ने कहा था कि उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए आवश्यक सरकारी मंज़ूरी नहीं ली गई थी और उन्होंने कोयला ब्लॉक आवंटन के फ़ैसले में किसी भी तरह की आपराधिक भूमिका से इनकार किया था. विशेष सीबीआई न्यायाधीश भरत पराशर ने छह अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120-बी (आपराधिक साज़िश) और धारा 409 (लोक सेवक, बैंकर, व्यापारी या एजेंट द्वारा आपराधिक विश्वासघात) तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसीए) के प्रावधानों के तहत अभियुक्त के रूप में तलब किया था. इन तीनों के अलावा अदालत ने एम/एस हिंडाल्को, उसके अधिकारियों शुभेंदु अमिताभ और डी. भट्टाचार्य को भी इस मामले में अभियुक्त बनाया था. सीबीआई ने अपनी एफ़आईआर में पीसी पारख, कुमार मंगलम बिड़ला, एम/एस हिंडाल्को इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड और कुछ अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 120-बी (आपराधिक साज़िश) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था. हालांकि, बाद में सीबीआई ने अदालत में क्लोज़र रिपोर्ट दाख़िल कर दी थी, जिसे अदालत ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया. इसके बाद अदालत ने सीबीआई को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से पूछताछ करने का निर्देश दिया था. इनमें उस समय के प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव टी.के.ए. नायर और निजी सचिव बी.वी.आर. सुब्रमण्यम भी शामिल थे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश के पास सीबीआई की क्लोज़र रिपोर्ट को ख़ारिज करने और मामले में संज्ञान लेने का कोई उचित कारण नहीं था. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ पीठ ने कहा, "अपीलकर्ता के दुर्भाग्यपूर्ण निधन के कारण इस अपील को निरर्थक मानकर समाप्त किया जा सकता था. लेकिन विशेष न्यायाधीश द्वारा संज्ञान लेने और अपीलकर्ता को समन जारी करने के मुद्दे पर विचार करने के लिए हमने सीबीआई की दोनों क्लोज़र रिपोर्टों का अध्ययन किया." अदालत ने कहा, "जांच एजेंसी की रिपोर्ट स्वीकार करने को लेकर इस अदालत द्वारा समय-समय पर तय किए गए सिद्धांतों को देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि विशेष न्यायाधीश के पास सीबीआई की क्लोज़र रिपोर्ट को ख़ारिज करने और मामले में संज्ञान लेने का कोई कारण नहीं था." पीठ ने कहा, "हम अपील स्वीकार करते हैं और चुनौती दिए गए आदेश को रद्द करते हैं. इसके परिणामस्वरूप हम सीबीआई की क्लोज़र रिपोर्ट स्वीकार करते हैं और मामले को बंद करते हैं." साल 2012 में भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक रिपोर्ट सामने आई थी जिसमें साल 1993 से 2010 तक कोयला ब्लॉकों के अवैध और मनमाने ढंग से निजी और सार्वजनिक कंपनियों को बिना पारदर्शी नीलामी के आवंटन का आरोप लगाया गया था. रिपोर्ट में दावा किया गया था कि निजी कंपनियों को कोयले की खदानें मिलने से सरकार को 1.86 लाख करोड़ का नुक़सान हुआ क्योंकि इन कंपनियों को कोयले की खदान बिना कोई बोली लगाए दे दी गई थीं. विश्लेषकों का कहना था कि अगर इन कोयला खदानों की नीलामी की गई होती तो सरकार को इतना घाटा नहीं उठाना पड़ा होता. सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक़, एसार पावर, हिंडाल्को, टाटा स्टील, टाटा पावर, जिंदल स्टील एंड पावर सहित 25 कंपनियों को विभिन्न राज्यों में कोयले की खानें दी गईं. सीएजी की यह रिपोर्ट संसद में पेश की गई थी. साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने साल 1993 से 2010 के बीच हुए कोयले के ब्लॉक आवंटन को अवैध ठहराया था. प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह की अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेंस तीन जनवरी 2014 को हुई थी, जो एक घंटे से ज़्यादा समय तक चली थी. इस दौरान मनमोहन सिंह से पूछा गया, "यूपीए-1 से यूपीए-2 तक लगातार एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मुद्दे सामने आए हैं, आपकी मिस्टर क्लीन की जो छवि थी आपको नहीं लगता है कि जब आप कुर्सी छोड़ने वाले हैं, तो वो छवि दागदार हुई है?" इस सवाल के जवाब में मनमोहन सिंह ने कहा, "जहाँ तक भ्रष्टाचार के आरोपों का सवाल है तो इनमें से ज़्यादातर आरोप यूपीए-1 से जुड़े हैं. कोल ब्लॉक आवंटन, 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन दोनों ही यूपीए-1 के दौर के हैं. हम अपने काम के आधार पर वोटर के सामने गए और भारत की जनता ने हमें दोबारा जनादेश दिया." "ये मुद्दे समय-समय पर मीडिया, सीएजी और कोर्ट में उठता रहा है लेकिन भारत की जनता ने हम पर दोबारा भरोसा जताया और भ्रष्टाचार के आरोपों को मुझसे या मेरी पार्टी से नहीं जोड़ा." भ्रष्टाचार मुद्दे पर उनसे फिर सवाल पूछा गया, "क्या आपको नहीं लगता है कि यूपीए-1 के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण आपकी सरकार को बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी? मनमोहन सिंह ने कहा, "मैं इस मामले में थोड़ा दुःखी महसूस करता हूं क्योंकि मैंने ही इस बात पर ज़ोर दिया था कि स्पेक्ट्रम आवंटन पारदर्शी और निष्पक्ष हो. मैं ही था जिसने ज़ोर देकर कहा था कि कोल ब्लॉक का आवंटन नीलामी के आधार पर हो, लेकिन इन तथ्यों को भुला दिया गया. इस मामले में विपक्ष का अपना स्वार्थ निहित था. कुछ मौक़ों पर मीडिया उनके हाथ का खिलौना भी बन गया." "इसलिए मेरे पास इसकी हर वजह है कि जब भी इस समय का इतिहास लिखा जाएगा, हम बेदाग़ बाहर आएंगे. इसका मतलब यह नहीं है कि कोई अनियमितता नहीं हुई लेकिन इस समस्या की दिशा को मीडिया, कुछ मौक़ों पर सीएजी और अन्य लोगों ने बढ़ा चढ़ाकर पेश किया." यह वो दौर था, जब केंद्र सरकार पर कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे थे. विपक्षी दल कॉमनवेल्थ गेम्स-2010, कोल ब्लॉक आवंटन और 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे थे. केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई पर भी सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख़ टिप्पणी की थी. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में उनके कई मंत्रियों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे. इसी पर उनसे एक सवाल किया गया कि अपने मंत्रियों पर कार्रवाई करने में नाकाम रहे हैं? मनमोहन सिंह ने कहा, "मैं मानता हूँ कि इतिहास मेरे प्रति आज के मीडिया के मुक़ाबले ज़्यादा उदार होगा." मनमोहन सिंह ने कहा कि "यह फ़ैसला इतिहासकारों को करना है कि मैंने क्या किया और क्या नहीं किया." "जहाँ तक मेरा सवाल है तो जिन परिस्थितियों और आर्थिक मंदी के हालात में मैंने काम किया है, मैंने बेहतर काम किया है. हमने अपने नौ साल के शासनकाल में भारत की आज़ादी के बाद सबसे ज़्यादा विकास दर को बनाए रखा." सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से माफ़ी की मांग की है. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कोर्ट के फ़ैसले को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर साझा करते हुए कहा, "प्रधानमंत्री देश से माफ़ी मांगें." इस पर कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने एक्स पर लिखा, "अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन वास्तव में करप्शन अगेंस्ट इंडिया था." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

स्रोत: BBC Hindi

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