बरकतुल्लाह भोपाली: वह शख़्स जो भारत की पहली निर्वासित सरकार का प्रधानमंत्री बना
क्या आपको पता है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री कौन थे? आमतौर पर आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू का नाम लिया जाता है. लेकिन उससे पहले दो निर्वासित अंतरिम सरकारें बनी थीं. 1915 में बनी पहली निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली थे. आजकल उनके नाम पर बनी बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी का नाम बदलने के प्रस्ताव को लेकर चर्चा हो रही है. भारत की आज़ादी के लिए लड़ने वाले और अफ़ग़ानिस्तान में पहली निर्वासित अंतरिम सरकार बनाने वाले मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली ने अमेरिका में मृत्युशय्या पर कहा था, "पूरी ज़िंदगी मैंने अपने देश की आज़ादी के लिए काम किया. मुझे ख़ुशी है कि मेरा जीवन अपने वतन की भलाई में गुज़रा." उन्होंने कहा था, "अफ़सोस है कि मैं अपनी ज़िंदगी में उसका परिणाम नहीं देख पाया. लेकिन मुझे संतोष है कि हज़ारों नौजवान सच्ची नीयत और दृढ़ संकल्प के साथ आज़ादी की लड़ाई में शामिल हुए. मैं पूरे विश्वास के साथ अपने देश का भविष्य उनके हाथों में सौंप रहा हूं." मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में उनके नाम पर बनी बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी का नाम बदलने के प्रस्ताव ने कई लोगों को परेशान कर दिया. इसके बाद सिविल सोसायटी के लोगों ने इसका विरोध किया. बाद में यह प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया गया. बरकतुल्लाह के जीवन और उनकी अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों पर बात करने से पहले इस विवाद को समझना ज़रूरी है. नाम बदलने के प्रस्ताव के ख़िलाफ़ यूनिवर्सिटी के मुख्य द्वार पर छात्रों ने प्रदर्शन किया. सिविल सोसायटी के लोगों ने भी विरोध दर्ज कराया. स्थानीय अख़बारों में उनके जीवन और योगदान पर लेख प्रकाशित हुए. पूर्व महापौर दीपचंद यादव ने बीबीसी से कहा, "यह उस सोच का नतीजा है जो जनता के लिए काम कम करती है और नाम बदलने में ज़्यादा दिलचस्पी रखती है." उन्होंने कहा कि दुख की बात है कि यह प्रस्ताव सिर्फ़ इसलिए लाया गया क्योंकि बरकतुल्लाह मुसलमान थे. उनका कहना था कि यह स्थिति सिर्फ़ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी देखने को मिल रही है. उन्होंने कहा, "रामायण मुग़ल काल में लिखी गई. जायसी की पद्मावत खिलजी दौर में लिखी गई. ये सब उन्हें स्वीकार हैं, लेकिन मुसलमान नहीं." देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. बरकतुल्लाह के माता-पिता 1857 के विद्रोह के बाद उत्तर प्रदेश के बदायूं से भोपाल आ गए थे. यहीं बरकतुल्लाह का जन्म हुआ. उनकी जीवनी लिखने वाले एम. इरफ़ान के अनुसार उनका जन्म 1858 या 1859 में हुआ था. हालांकि बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर डॉ. हसन ख़ान का कहना है कि कैलिफ़ोर्निया के सैक्रामेंटो में मौजूद उनकी क़ब्र पर लिखा है कि 1927 में उनका निधन 60 साल की उम्र में हुआ था. इस हिसाब से उनका जन्म 1867 में माना जा सकता है. इतिहासकार अशअर क़दवई ने उस मोहल्ले का दौरा किया जहां बरकतुल्लाह का जन्म हुआ था. बरकतुल्लाह ने काहिरा के अल-अज़हर विश्वविद्यालय से जुड़े अबू नस्र सैयद अहमद भोपाली को एक पत्र में लिखा था कि उनका जन्म मोचियों के मोहल्ले में हकीम क़ादिर अली ख़ान के मकान में हुआ था. वहां उनका बचपन बीता और वहीं उनकी नाल दफ़न की गई थी. बरकतुल्लाह ने अपनी शुरुआती शिक्षा मदरसा सुलेमानिया में हासिल की. बाद में उन्होंने फ़ारसी, अरबी, धर्मशास्त्र, नैतिकता और दर्शन का अध्ययन किया. मोटी मस्जिद में रहने के दौरान उन्होंने फ़ारसी सीखी. वहीं सुलेमानिया में अरबी और धार्मिक शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने अरबी भाषा में गहरी पकड़ बना ली. लेकिन जल्द ही उन्हें महसूस हुआ कि अंग्रेज़ी जाने बिना वह इस्लाम और मुस्लिम समाज की बेहतर सेवा नहीं कर सकते. शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने उसी मदरसे में अध्यापन भी किया. कहा जाता है कि बरकतुल्लाह शाह वलीउल्लाह देहलवी की प्रसिद्ध पुस्तक हुज्जतुल्लाह अल-बालिग़ा से बहुत प्रभावित थे. 19वीं सदी के प्रसिद्ध विचारक जमालुद्दीन अफ़ग़ानी के भोपाल दौरे के बाद एक दिन वह अचानक भोपाल छोड़कर चले गए. कुछ लोगों के अनुसार वह पहले जबलपुर गए और वहां अंग्रेज़ी सीखी. लेकिन एक पत्र में बरकतुल्लाह ने लिखा कि वह पहले बंबई गए थे, जहां उन्होंने अंग्रेज़ी की औपचारिक शिक्षा ली. यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी पढ़ाई और यात्रा का ख़र्च किसने उठाया. इंग्लैंड में एक बात ने उन्हें सबसे अधिक झकझोर दिया. वहां के लोगों की समृद्धि. वह कहते थे कि महारानी विक्टोरिया भारत की भी महारानी थीं. फिर भी भारत के लोग ग़रीब थे. दूसरी ओर भारत से जाने वाली दौलत से ब्रिटेन चमक रहा था. इंग्लैंड में वह गोपाल कृष्ण गोखले के भाषण सुनते थे. लेकिन बाद में उन्होंने गोखले की उदारवादी नीति से दूरी बना ली. उनके मन में एक स्वतंत्र भारत का सपना आकार लेने लगा. ईरानी मूल के प्रोफ़ेसर आगा मिर्ज़ा शास्त्री ने बताया कि बरकतुल्लाह ने वहां अंग्रेज़ी पर ध्यान देने के बजाय जर्मन, फ़्रांसीसी, तुर्की और जापानी भाषाएं सीख लीं. वह अरबी पढ़ाने लगे और अख़बारों में लेख लिखने लगे. वह एक पुराने मकान में रहते थे. कई बार उन्हें कई दिनों तक भूखा भी रहना पड़ता था. इमेज स्रोत, Abdullah Quilliam Society अरबी भाषा पर उनकी पकड़ के कारण उनकी पहचान बढ़ी और उन्हें लिवरपूल के ओरिएंटल कॉलेज में पढ़ाने का अवसर मिला. उसी दौरान विलियम हेनरी क़ुइलियम ने इस्लाम स्वीकार किया और अपना नाम अब्दुल्लाह क़ुइलियम रख लिया. ये आगे चलकर इंग्लैंड के पहले मुस्लिम धर्मगुरुओं में से एक माने जाने लगे. तुर्की के ख़लीफ़ा ने उन्हें इंग्लैंड का "शेख़-उल-इस्लाम" घोषित किया. उन्होंने अपने घर को मस्जिद और मदरसे में बदल दिया और उसका नाम मुस्लिम इंस्टीट्यूट रखा. वहीं से द क्रेसेंट और इस्लामिक वर्ल्ड नामक पत्रिकाएं निकलती थीं. अब्दुल्लाह क़ुइलियम के निमंत्रण पर बरकतुल्लाह भी इस संस्था से जुड़ गए. वह अरबी और तुर्की पढ़ाने लगे और पत्रिकाओं के प्रकाशन में सहयोग करने लगे. इन पत्रिकाओं से भोपाल के लोगों को पहली बार पता चला कि बरकतुल्लाह इंग्लैंड में हैं. बरकतुल्लाह का मानना था कि भारत की आज़ादी के लिए हिंदू-मुस्लिम एकता बेहद ज़रूरी है. उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी और कवि हसरत मोहानी को एक पत्र लिखा. इस पत्र में उन्होंने स्वतंत्र भारत की एक रूपरेखा भी पेश की. उन्होंने लिखा कि दुनिया में मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी भारत में रहती है और उनकी तरक़्क़ी भारत के मुसलमानों की बेहतरी से जुड़ी है. 3 अक्तूबर 1915 को भारत, तुर्की और जर्मनी का संयुक्त मिशन काबुल पहुंचा. वहां उसकी मुलाक़ात अफ़ग़ान शासक अमीर हबीबुल्लाह ख़ान से हुई. लगातार बैठकों के बाद 1 दिसंबर 1915 को निर्वासित अंतरिम सरकार बनाई गई. राजा महेंद्र प्रताप इसके राष्ट्रपति बने. बरकतुल्लाह को प्रधानमंत्री बनाया गया. जबकि मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी को गृह मंत्री नियुक्त किया गया. उसी समय भारत में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ रेशमी रुमाल आंदोलन भी चल रहा था. बाद में बरकतुल्लाह अमेरिका गए और ग़दर पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए. उन्होंने संगठन की पत्रिका का संपादन किया और नेतृत्व की भूमिका भी निभाई. 1919 में अमीर हबीबुल्लाह ख़ान की हत्या के बाद उनके बेटे अमानुल्लाह ख़ान ने उन्हें फिर अफ़ग़ानिस्तान बुलाया. दोनों ने मिलकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ रणनीति बनाने की कोशिश की. दिलचस्प बात यह है कि दूसरी निर्वासित सरकार सुभाष चंद्र बोस ने 21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर में बनाई थी. इतिहासकारों के अनुसार बरकतुल्लाह और सुभाष चंद्र बोस के रास्तों में कई समानताएं थीं. दोनों पहले अफ़ग़ानिस्तान पहुंचे. दोनों ने काबुल के बाबर बाग़ में समय बिताया. बाद में दोनों जर्मनी और जापान गए. बरकतुल्लाह बाद में अफ़ग़ानिस्तान के प्रतिनिधि के रूप में रूस भेजे गए. तब तक रूस में क्रांति हो चुकी थी. पत्रकार इक़बाल मसूद के मुताबिक़ बरकतुल्लाह की मुलाक़ात लेव ट्रॉट्स्की और फिर व्लादिमीर लेनिन से हुई. उनकी जीवनी में उन्हें भारत और रूस के बीच मैत्री का शुरुआती सूत्रधार बताया गया है. कहा जाता है कि रूसी क्रांति के बाद लेनिन को जो चंदन की छड़ी भेंट की गई थी, वह भारतीयों की ओर से भेजी गई थी. जांच में पता चला कि इसे "मुहम्मद हादी" नाम के व्यक्ति ने भेजा था. बाद में मालूम हुआ कि मुहम्मद हादी कोई और नहीं बल्कि ख़ुद बरकतुल्लाह थे. उन्होंने ब्रिटिश जासूसों को धोखा देने के लिए यह नाम अपनाया था. बाद में राजा महेंद्र प्रताप ने भी इसकी पुष्टि की. मई 1919 में बरकतुल्लाह के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने लेनिन से मुलाक़ात की. इस प्रतिनिधिमंडल में राजा महेंद्र प्रताप, मौलवी अब्दुल रब और प्रतिवादी आचार्य जैसे लोग शामिल थे. राजा महेंद्र प्रताप ने लिखा कि वह रूस सरकार के मेहमान थे. वहां उनकी मुलाक़ात बरकतुल्लाह से हुई, जो पहले से रूस में मौजूद थे. बरकतुल्लाह ने रूसियों के साथ अच्छे संबंध बना लिए थे. अफ़ग़ान शासक और ब्रिटिश सरकार के बीच समझौते के बाद निर्वासित सरकार भंग हो गई. लेकिन बरकतुल्लाह बोल्शेविक क्रांति के विचारों को मुस्लिम दुनिया तक पहुंचाना चाहते थे. लेनिन ने इस काम में सहयोग का आश्वासन भी दिया. 1922 में बीमार पड़ने के बाद बरकतुल्लाह रूस से जर्मनी गए. उनके इलाज के लिए सैन फ़्रांसिस्को से एक हज़ार डॉलर भेजे गए. राजा महेंद्र प्रताप भी उनसे मिलने पहुंचे. फ़रवरी 1927 में बरकतुल्लाह ब्रसेल्स में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में शामिल हुए. वहीं उनकी मुलाक़ात जवाहरलाल नेहरू से हुई. नेहरू ने अपनी आत्मकथा में इस मुलाक़ात का ज़िक्र किया. इसके बाद बरकतुल्लाह तीसरी और आख़िरी बार अमेरिका गए. वह देश-देश घूमकर भारत की आज़ादी की आवाज़ उठाते रहे. आख़िरकार सैन फ़्रांसिस्को में उनका निधन हो गया. बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर डॉ. हसन ख़ान के अनुसार सैक्रामेंटो में स्थित उनकी क़ब्र पर उनकी मृत्यु की तारीख़ 20 सितंबर 1927 दर्ज है. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi