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'वंदे मातरम्' पर कांग्रेस का नौ दशक पुराना प्रस्ताव क्या है और बीजेपी ने क्यों उठाए सवाल?

✍️ Admin 📅 20 August, 2026 ⏰ 08:27 PM 👁 53 views

कांग्रेस कार्यसमिति ने फ़ैसला किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे. कांग्रेस पार्टी ने ये फ़ैसला लेते हुए अपने क़रीब नौ दशक पुराने प्रस्ताव का हवाला दिया है. बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'आनंद मठ' से लिया गया 'वंदे मातरम्' भारत का राष्ट्रीय गीत है और इसे राष्ट्रगान 'जन गण मन' जैसा ही दर्जा प्राप्त है. कांग्रेस पार्टी के इस फ़ैसले ने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को लेकर जारी विवाद को और तेज़ कर दिया है. कुछ महीने पहले ही भारत की संसद ने वंदे मातरम् गीत के गायन को जानबूझकर रोकने या इसमें व्यवधान डालने के प्रयासों को आपराधिक बना दिया था. 'वंदे मातरम्' के पूर्ण संस्करण को हाल ही में राष्ट्रगान के समान क़ानूनी संरक्षण दिया गया है. इसके तहत सभी सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य किया गया है. बीजेपी वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस पार्टी पर हमलावर है. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. कांग्रेस पार्टी के स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में वंदे मातरम् के गायन और फिर उसके बाद गोवा में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की मौजूदगी में हुए एक कार्यक्रम में इस गीत के गायन को लेकर बीजेपी कांग्रेस पार्टी पर सवाल उठा रही है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 'वंदे मातरम्' पूरा गाने की जगह केवल दो अंतरे गाने के कांग्रेस कार्यसमिति के फ़ैसले को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा है. अमित शाह ने एक्स पर लिखा कि कांग्रेस कार्यसमिति का यह फैसला "देशविरोधी" है और संसद द्वारा बनाए गए क़ानून की खुली अवहेलना है. उन्होंने दावा किया कि 1937 में तुष्टीकरण की राजनीति के तहत कांग्रेस ने 'वंदे मातरम्' के दो हिस्से किए, जिससे दो-राष्ट्र सिद्धांत को ताक़त मिली और आगे चलकर देश का विभाजन हुआ. शाह ने कहा कि 'वंदे मातरम्' के 150वें वर्ष पर मोदी सरकार ने इस ऐतिहासिक ग़लती को सुधारते हुए पूरे गान को क़ानूनी स्वरूप दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक बार फिर वोट बैंक की राजनीति के लिए तुष्टीकरण के रास्ते पर जा रही है. अमित शाह ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि 'वंदे मातरम्' को लेकर कांग्रेस के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ उठानी चाहिए. उन्होंने कहा कि देश पहले ही 'वंदे मातरम्' को लेकर हुई इस ग़लती के परिणाम भुगत चुका है. उन्होंने कहा, "देश की जनता वंदे मातरम् का कोई विरोध बर्दाश्त नहीं करेगी." वहीं बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक्स पर पोस्ट किए गए एक बयान में कहा, "कांग्रेस शुरू से ही समझौते, तुष्टीकरण और विभाजनकारी शक्तियों के सामने घुटने टेकने की राजनीति करती रही है. उसने हमेशा राष्ट्रीय नैतिकता, राष्ट्रीय मूल्यों और राष्ट्रीय भावना के साथ समझौता किया है. उस दौर की कांग्रेस इसका जीता-जागता प्रमाण है." कांग्रेस का कहना है कि वह इस गीत के पहले दो अंतरों तक ही सीमित रहेगी. कांग्रेस की कार्यसमिति के फ़ैसले के बाद कांग्रेस पार्टी के महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि पार्टी 1937 में लिए गए अपने फ़ैसले का पालन करेगी. केसी वेणुगोपाल ने कहा, "हम 1937 से 'वंदे मातरम्' गाते आ रहे हैं, यानी 90 साल से भी ज़्यादा समय से. हमारे लिए इसमें नया क्या है? बीजेपी स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा नहीं थी. 'वंदे मातरम्' स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा था. यह हमारे लिए भावनात्मक मुद्दा है, लेकिन उनके (बीजेपी) लिए राजनीतिक मुद्दा है. वे पेपर लीक, चंदे की चोरी और अरुणाचल प्रदेश में चीन की घुसपैठ जैसे वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाना चाहते हैं." 1937 में कांग्रेस पार्टी की कार्यसमिति ने प्रस्ताव पारित किया था जिसमें पार्टी के कार्यक्रमों में इस गीत के सिर्फ़ पहले दो अंतरों के गायन की सिफ़ारिश की गई थी. कांग्रेस पार्टी ने अब लिए गए अपने फ़ैसले के समर्थन में महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल के रुख़ का भी हवाला दिया है. बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने साल 1875 में संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में 'वंदे मातरम्' (मां मैं तुम्हें नमन करता हूं) गीत की रचना की थी. बाद में इसे उन्होंने अपने चर्चित उपन्यास 'आनंद मठ' में शामिल किया था. 18वीं सदी के अंतिम दौर की कहानी कहने वाले 'आनंद मठ' उपन्यास की पृष्ठभूमि संन्यासी विद्रोह है. ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में शासन के शुरुआती दशकों में इसके ख़िलाफ़ बंगाल में संन्यासी विद्रोह हुआ था. 'वंदे मातरम्' गीत 1905 से 1908 के दौरान हुए स्वदेशी आंदोलन में एक नारे के रूप में भी गूंजा और यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ गहराई से जुड़ता चला गया. अक्तूबर 1937 में जवाहरलाल नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखकर इस गीत को लेकर आशंकाओं का ज़िक़्र करते हुए कहा था कि 'आनंद मठ' की पृष्ठभूमि की वजह से इस गीत से मुसलमानों की भावनाएं आहत हो सकती हैं. हालांकि, नेहरू ने अपने पत्र में यह भी कहा था कि गीत को लेकर जो विरोध की आवाज़ें हैं उन्हें सांप्रदायिक लोगों ने बढ़ावा दिया है. 1937 में कांग्रेस की कार्यसमिति ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा था कि जब भी किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम में वंदे मातरम् गीत को गाया जाए तब सिर्फ़ पहले दो अंतरे ही गाए जाएं. इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि गीत के पहले दो अंतरों में ऐसा कुछ नहीं है जिसे लेकर किसी को आपत्ति हो और बाद के अंतरे बहुत चर्चित नहीं हैं. हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के 1937 के अधिवेशन के प्रस्ताव को लेकर भी सवाल उठाए थे. पिछले साल दिसंबर में, वंदे मातरम् गीत के 150 वर्ष पूरे होने के मौक़े पर संसद में दिए भाषण में मोदी ने कहा था, "जब वंदे मातरम् के पचास वर्ष हुए तब देश गुलामी में जीने के लिए मजबूर था. जब इसके 100 साल हुए देश आपातकाल की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था. तब भारत के संविधान का गला घोंट दिया गया था." उन्होंने कहा, "इसके 150 वर्ष उस महान अध्याय को उस गौरव को पुनःस्थापित करने का अवसर है." पीएम मोदी ने कहा, "यह गीत ऐसे समय पर लिखा गया जब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज़ सल्तनत बौखलाई हुई थी. भारत पर भांति-भांति का दबाव था, भांति-भांति के ज़ुल्म कर रही थी और भारत के लोगों को अंग्रेज़ों के द्वारा मजबूर किया जा रहा था." इससे कुछ दिन पहले 'वंदे मातरम्' की 150वीं वर्षगांठ से जुड़े कार्यक्रमों की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाया था कि, कांग्रेस ने 1937 के फ़ैज़ाबाद अधिवेशन से पहले 'वंदे मातरम् के कुछ अहम हिस्सों को हटा दिया था.' उन्होंने तब कहा था, "1937 में वंदे मातरम् के कुछ अहम पदों को, उसकी आत्मा के एक हिस्से को हटा दिया गया था. वंदे मातरम् को तोड़ दिया गया था. ये अन्याय क्यों किया गया. इसी ने विभाजन के बीज बोए." इमेज स्रोत, Twitter@RailMinIndia इस गीत के पहले दो अंतरों में मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन किया गया है. इसमें धरती की उर्वरता, जल और हरियाली का वर्णन है. 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि वंदे मातरम् ने "भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है" और इसे जन गण मन के साथ "समान रूप से सम्मानित" किया जाएगा. वंदे मातरम् गीत के जिस संस्करण को पारंपरिक रूप से राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है, उसमें इसके पहले दो अंतरे ही शामिल हैं. मुसलमान विद्वान मानते हैं कि भारत माता को देवी के रूप में प्रस्तुत करना और उसकी अराधना करना इस्लाम के एकेश्वरवाद के मूल सिद्धांत के ख़िलाफ़ है. इस्लाम अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा की अनुमति नहीं देता है. मुसलमान विद्वानों की यही व्याख्या इस गीत के बाद के अंतरों को मुसलमानों के लिए विवादित बना देती है. वंदे मातरम् के तीसरे अंतरे में मातृभूमि की रक्षा के लिए तलवार उठाने को तैयार "करोड़ों-करोड़ों" भुजाओं का ज़िक्र किया गया है. गीत के चौथे अंतरे में कहा गया है कि मातृभूमि की छवि हर मंदिर में उकेरी गई है. पांचवें अंतरे में मातृभूमि की तुलना देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती से की गई है. इस गीत को लेकर सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि यह गीत एक धर्म विशेष के हिसाब से भारतीय राष्ट्रवाद को परिभाषित करता है. हिंदुत्व रिसर्चर स्निगधेंदु भट्टाचार्य के मुताबिक़, 1937 की शुरुआत से मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीडरशिप के एक तबके ने वंदे मातरम् का विरोध करना शुरू किया था. कांग्रेस ने रबींद्रनाथ टैगोर से भी इस गीत को लेकर राय मांगी थी. रिसर्चर स्निगधेंदु भट्टाचार्य के मुताबिक़, "रबींद्रनाथ का मानना था कि मुस्लिम समुदाय समेत किसी को भी गीत के शुरुआती दो छंदों पर आपत्ति जताने की कोई वजह नहीं है. लेकिन बाद के छंदों पर आपत्ति करने के लिए काफ़ी कारण थे. उन्होंने यह भी कहा कि पहले दो छंदों को नॉवेल से पूरी तरह अलग रखने में उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं हुई. रबींद्रनाथ की सलाह पर, कांग्रेस ने तय किया कि पहले दो छंद सभी कार्यक्रमों में गाए जाएंगे." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi

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