ब्रिक्स से पहले भारत का ‘जैवलिन दांव’, अमेरिका से मिसाइल डील के पीछे क्या है रणनीति?
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में आई तल्खी के बीच भारत ने अमेरिका से करीब 100 जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल खरीदने का फैसला लिया है. करीब 45.7 मिलियन डॉलर यानी लगभग 300 करोड़ रुपये की इस डील को ऐसे समय में अहम माना जा रहा है, जब भारत एक तरफ रूस और चीन के साथ एससीओ और ब्रिक्स जैसे मंचों पर सक्रिय है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक और रक्षा संबंधों को भी संतुलित रखने की कोशिश कर रहा है. जैवलिन मिसाइल की खासियत इसकी ‘फायर एंड फॉरगेट’ तकनीक है, जिसके चलते इसे दुश्मन के टैंक और बंकरों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. भारत की योजना आगे चलकर इसके संयुक्त उत्पादन की दिशा में भी बढ़ने की है.
एलओसी से एलएसी तक जैवलिन की तैनाती की तैयारी
भारतीय सेना ने अमेरिका से करीब 100 एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल खरीदने के ऑफर पर हस्ताक्षर किए हैं. डील की कुल कीमत 45.7 मिलियन डॉलर यानी करीब 300 करोड़ रुपये बताई गई है. भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने इस डील को ‘बड़ी खबर’ बताया है. उनके मुताबिक, भारत युद्ध में परखे जा चुके जैवलिन एंटी-टैंक सिस्टम को खरीदने की योजना बना रहा है. उन्होंने कहा कि अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने मई 2026 में शांगरी-ला डायलॉग के दौरान जिस तरह भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने की बात कही थी, जैवलिन डील उसी दिशा में एक बड़ा कदम है. इससे दोनों देशों के बीच संयुक्त उत्पादन की संभावनाओं के रास्ते भी खुल सकते हैं.
क्या है जैवलिन मिसाइल की खासियत?
जैवलिन एक एडवांस मीडियम-रेंज ‘फायर एंड फॉरगेट’ एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल है. इसे अमेरिका की आरटीएक्स और लॉकहीड मार्टिन मिलकर बनाती हैं. अमेरिकी सेना और मरीन कॉर्प्स के अलावा कई देशों की सेनाएं इसका इस्तेमाल करती हैं. जैवलिन का इस्तेमाल मुख्य रूप से दुश्मन के टैंकों और बंकरों को तबाह करने के लिए किया जाता है. इसकी मारक क्षमता करीब 2.5 किलोमीटर बताई जाती है. इसे एक सैनिक कंधे से या ट्राइपॉड के जरिए लॉन्च कर सकता है. इसकी ‘फायर एंड फॉरगेट’ क्षमता का मतलब है कि लक्ष्य लॉक करने के बाद मिसाइल को लगातार ऑपरेटर द्वारा निर्देशित करने की जरूरत नहीं पड़ती.
100 मिसाइल राउंड और 25 लॉन्च यूनिट खरीदेगा भारत
फॉरेन मिलिट्री सेल्स यानी एफएमएस के तहत भारत ने 100 जैवलिन राउंड्स के साथ एक जैवलिन मिसाइल एफजीएम-148, 25 लाइटवेट कमांड लॉन्च यूनिट और उनसे जुड़े उपकरण खरीदने का फैसला किया है. भारतीय सेना पहले से ही अमेरिका से खरीदी गई एम-777 लाइट होवित्जर तोपों का इस्तेमाल करती है. इन तोपों का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकियों के ठिकानों और पाकिस्तानी सेना की चौकियों को निशाना बनाने के लिए किया गया था. इसके अलावा भारतीय सैनिक अमेरिकी सिग-सॉयर राइफलों का भी इस्तेमाल करते हैं.
अमेरिका ने पिछले साल ही दी थी बिक्री को मंजूरी
अमेरिकी रक्षा विभाग की डिफेंस सिक्योरिटी कोऑपरेशन एजेंसी ने पिछले साल इस डील को मंजूरी देने के दौरान कहा था कि प्रस्तावित बिक्री अमेरिका की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करेगी. इससे भारत-अमेरिका के रणनीतिक संबंध मजबूत होंगे और भारत की सुरक्षा क्षमता बेहतर होगी.
अमेरिका के मुताबिक, भारत हिंद-प्रशांत और दक्षिण एशिया क्षेत्र में राजनीतिक स्थिरता, शांति और आर्थिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण ताकत है. प्रस्तावित बिक्री से भारत की मौजूदा और भविष्य के खतरों से निपटने की क्षमता बढ़ेगी और क्षेत्रीय खतरों को रोकने में मदद मिलेगी. हालांकि, अमेरिका ने यह भी कहा था कि इस बिक्री से क्षेत्र में मौजूदा बुनियादी सैन्य संतुलन में बदलाव नहीं आएगा.
भारत में भी बन सकती है जैवलिन मिसाइल
आने वाले समय में जैवलिन मिसाइलों का भारत में उत्पादन भी शुरू होने की संभावना है. आरटीएक्स यानी रेथियॉन और लॉकहीड मार्टिन ने कुछ महीने पहले भारत डायनामिक्स लिमिटेड यानी बीडीएल के साथ इस दिशा में करार किया था. हालांकि, बीडीएल खुद भी स्वदेशी अमोघ और एमपी-एटीजीएम यानी मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. इसे भी सैनिक कंधे से लॉन्च कर सकते हैं. ऐसे में जैवलिन की खरीद के साथ भारत का लक्ष्य तत्काल जरूरत पूरी करने के अलावा भविष्य में स्वदेशी और संयुक्त उत्पादन क्षमता विकसित करना भी माना जा रहा है.
मिलन और कोंकर्स के बाद जैवलिन क्यों?
भारतीय थलसेना फिलहाल फ्रांस की मिलन और रूस की कोंकर्स एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों का इस्तेमाल करती है. नियंत्रण रेखा से लेकर वास्तविक नियंत्रण रेखा तक अलग-अलग तरह की चुनौतियों को देखते हुए भारतीय सेना की इन्फैंट्री रेजीमेंटों को बड़ी संख्या में एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलों की जरूरत है.
करीब पांच-छह साल पहले नियंत्रण रेखा पर तनाव के दौरान भारतीय सेना ने मिलन और कोंकर्स मिसाइलों का इस्तेमाल कर पाकिस्तान की कई चौकियों को निशाना बनाया था. हालांकि, जैवलिन को इन प्रणालियों की तुलना में अधिक आधुनिक माना जाता है. यही वजह है कि भारत ने जैवलिन की खरीद के साथ इसके साझा निर्माण की दिशा में भी कदम बढ़ाया है.
डील के बाद अमेरिकी दूतावास ने कहा कि जैवलिन समझौता भारतीय सेना के लिए अमेरिकी समर्थन की गहराई को दर्शाता है और दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच साथ काम करने के नए अवसर पैदा करता है. अमेरिका ने भविष्य में दोनों देशों के रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करने की बड़ी संभावनाओं की भी बात कही है.
ब्रिक्स से पहले जैवलिन डील क्यों?
जैवलिन डील का रणनीतिक महत्व सिर्फ सैन्य जरूरतों तक सीमित नहीं माना जा रहा है. अगले कुछ दिनों में एससीओ और ब्रिक्स की अहम बैठकें होने जा रही हैं. ऐसे समय में भारत एक तरफ रूस और चीन के साथ बहुपक्षीय मंचों पर अपनी भागीदारी बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग को भी मजबूत कर रहा है.
अगले महीने दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होने जा रहा है. इसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शामिल होने की संभावना है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर के हालिया मॉस्को दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निमंत्रण पुतिन तक पहुंचाया गया है. वहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की चीन यात्रा को भी भारत-चीन सीमा पर शांति बनाए रखने की कोशिशों से जोड़कर देखा जा रहा है.
रूस-चीन के बीच अमेरिका से रक्षा साझेदारी का संदेश
ब्रिक्स में डि-डॉलराइजेशन को लेकर होने वाली चर्चाओं और भारत के रूस से तेल व रक्षा उपकरण खरीदने को लेकर अमेरिका की चिंताओं के बीच जैवलिन डील को भारत-अमेरिका संबंधों में संतुलन बनाने वाले कदम के तौर पर देखा जा रहा है. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के भी ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है. अगर पुतिन, शी जिनपिंग और पेजेशकियन एक ही मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करते हैं, तो इसका भू-राजनीतिक महत्व काफी बड़ा होगा. ऐसे में ब्रिक्स से ठीक पहले अमेरिका से जैवलिन डील भारत की रणनीतिक संतुलन साधने की नीति का संकेत देती है.
स्रोत: ABP Hindi