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Death

डिलीवरी का अजीब मामला: डॉक्टरों को ऑपरेशन के दौरान पता चला कि महिला प्रेग्नेंट ही नहीं थी

✍️ Admin 📅 03 September, 2026 ⏰ 12:35 PM 👁 88 views

यह प्रसव से जुड़ा एक असामान्य मामला है. डॉक्टरों को ऑपरेशन के दौरान पता चला कि महिला के गर्भ में कोई बच्चा था ही नहीं. दरअसल, बच्चे की डिलीवरी के लिए यह ऑपरेशन 27 अगस्त को पाकिस्तान के सिंध प्रांत की राजधानी कराची में किया जा रहा था. नाज़िमाबाद के हमदर्द अस्पताल लाई गई महिला के परिवार का मानना था कि उनकी गर्भावस्था को नौ महीने हो चुके हैं. परिवार के पास मौजूद अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में भी 38 हफ़्ते की गर्भावस्था दिखाई गई थी. लेकिन ऑपरेशन के बाद जब परिवार को पता चला कि महिला के गर्भ में बच्चा है ही नहीं, तो वे भड़क गए. परिवार ने अस्पताल पर बच्चे को ग़ायब करने का आरोप लगाया. अस्पताल में हंगामे के बाद पुलिस भी वहां पहुंची. हालांकि, पुलिस की शुरुआती जांच के मुताबिक महिला ने कथित तौर पर अपनी गर्भावस्था के बारे में झूठ बोला था. पुलिस का कहना है कि महिला की शादी को तीन साल हो चुके थे. और परिवार की ओर से उस पर बच्चे के लिए दबाव था. इसी वजह से उन्होंने भी अपने गर्भवती होने की बात कही थी. यह मामला सामने आने के बाद एक सवाल यह भी उठ रहा है कि अस्पताल ने गर्भावस्था की स्वतंत्र रूप से पुष्टि किए बिना महिला का ऑपरेशन क्यों किया? हमदर्द अस्पताल के स्त्री रोग विभाग की प्रमुख डॉक्टर अंजुम आरा हसन ने अपने एक बयान में कहा कि महिला 27 अगस्त को अस्पताल आई थीं. उन्होंने एक अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट दिखाई थी. इसके आधार पर ड्यूटी डॉक्टर ने मेडिकल जांच और दूसरे टेस्ट के बाद ऑपरेशन करने का फ़ैसला किया. डॉक्टर अंजुम आरा के मुताबिक, इन टेस्ट में कार्डियोटोकोग्राफ़ी (सीटीजी) भी शामिल थी. बीबीसी ने इस मामले पर अस्पताल प्रशासन से और जानकारी मांगी. अस्पताल ने सिंध हेल्थकेयर कमीशन के फ़ैसले का इंतज़ार करने को कहा. हालांकि, मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था की सही पुष्टि के बिना ऐसा ऑपरेशन नहीं किया जा सकता. डॉक्टरों की पहली प्राथमिकता हमेशा सामान्य प्रसव कराने की होती है. कराची की पुलिस सर्जन डॉक्टर समिया का सवाल है, ''महिला के कथित तौर पर झूठ बोलने की बात ऑपरेशन से पहले सामने क्यों नहीं आ सकी?'' इस मामले की जांच डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल पुलिस ने की थी. जांच की ज़िम्मेदारी इंस्पेक्टर ख़ालिद रफ़ीक़ को सौंपी गई थी. पुलिस के मुताबिक, जब ऑपरेशन के दौरान मेडिकल स्टाफ़ को पता चला कि महिला के गर्भ में बच्चा है ही नहीं, तो महिला और उनका परिवार यह बात मानने को तैयार नहीं थे. इसके बाद अस्पताल में हंगामा हुआ. इंस्पेक्टर ख़ालिद रफ़ीक़ ने बीबीसी उर्दू को बताया कि महिला के पति ने लिखित शिकायत दर्ज कराई थी. अस्पताल से संपर्क करने पर वहां से बताया गया कि ''ऑपरेशन के दौरान महिला के गर्भ में बच्चा मौजूद ही नहीं था.'' पुलिस अधिकारी का कहना है कि यह उनके लिए हैरानी की बात थी. इसलिए जांच के लिए आधुनिक वैज्ञानिक तरीक़ों की मदद ली गई. ''महिला का तुरंत सरकारी अस्पताल में मेडिकल चेकअप और टेस्ट कराया गया. वहां से रिपोर्ट मिली कि महिला कभी गर्भवती हुई ही नहीं थीं.'' ''अस्पताल की रिपोर्ट आने के बाद भी महिला और उनका परिवार यह मानने को तैयार नहीं था. इसके बाद फ़ैसला किया गया कि सभी टेस्ट की जांच आगा ख़ान अस्पताल से कराई जाएगी.'' देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. इंस्पेक्टर ख़ालिद रफ़ीक़ आगे बताते हैं, ''हमने हमदर्द अस्पताल से सभी रिकॉर्ड अपने कब्ज़े में ले लिए थे और अस्पताल के पूरे स्टाफ़ के बयान भी दर्ज किए थे.'' ''जब पुलिस ने सभी टेस्ट और दूसरे सबूत जांच के लिए आगा ख़ान अस्पताल भेजे, तब महिला ने माना कि वह कभी गर्भवती हुई ही नहीं थीं और उन्होंने ग़लत जानकारी दी थी.'' पुलिस का दावा है कि महिला ने इसकी वजह ''सामाजिक दबाव'' बताई. पुलिस के मुताबिक, महिला ने आगे बताया, ''शादी के तीन साल बाद भी हमारे घर कोई बच्चा नहीं हुआ था. जबकि मेरे साथ की और मेरी उम्र की दूसरी महिलाएं मां बन चुकी थीं. यह बात मुझे अंदर ही अंदर परेशान कर रही थी. इसलिए मैंने परिवार को बता दिया कि मैं गर्भवती हूं.'' इंस्पेक्टर ख़ालिद रफ़ीक़ के मुताबिक, महिला को उम्मीद थी कि वह गर्भवती हो जाएंगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस बीच वह समय भी आ गया, जब उनकी डिलीवरी होने की उम्मीद थी. हालांकि, पुलिस के मुताबिक पत्नी के ''अफ़सोस जताने'' के बाद पति अब इस घटना को भूलकर आगे बढ़ना चाहते हैं. इंस्पेक्टर ख़ालिद रफ़ीक़ कहते हैं कि परिवार ने यह सवाल भी उठाया है, ''अगर महिला ने ग़लत जानकारी दी थी, तब भी यह बात किसी डॉक्टर की नज़र से कैसे छिपी रह सकती है? और अस्पताल ने पुष्टि किए बिना ऑपरेशन क्यों किया?'' महिला के पति ने अस्पताल के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की है. इस मामले की जांच चल रही है. इंस्पेक्टर ख़ालिद रफ़ीक़ के मुताबिक, ''उचित कार्रवाई सिंध हेल्थकेयर कमीशन ही कर सकता है. पुलिस अपनी पूरी जांच और जुटाए गए सभी सबूत सिंध हेल्थकेयर कमीशन को भेज देगी.'' हमदर्द अस्पताल के गाइनी विभाग की प्रमुख डॉक्टर अंजुम आरा हसन ने एक वीडियो बयान जारी किया है. अस्पताल के प्रवक्ता ने भी इस वीडियो बयान की पुष्टि की है. डॉक्टर अंजुम आरा के मुताबिक, महिला के मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज कुछ जानकारियां भी संदिग्ध थीं. उनका कहना है कि बाद में महिला ने दूसरे अस्पताल की एक अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट पेश की. इसमें गर्भावस्था की पुष्टि की गई थी. लेकिन अस्पताल के मुताबिक, यह रिपोर्ट भी कथित तौर पर फ़र्ज़ी थी. डॉक्टर अंजुम आरा के मुताबिक, 27 अगस्त को महिला इमरजेंसी में आई थीं. ड्यूटी डॉक्टर ने इसी रिपोर्ट के आधार पर उनकी मेडिकल जांच और ज़रूरी टेस्ट किए. इनमें सीटीजी भी शामिल था. इसके बाद ऑपरेशन करने का फ़ैसला लिया गया. डॉक्टर अंजुम आरा का कहना है कि ऑपरेशन के दौरान पता चला कि महिला गर्भवती नहीं थीं और उनके गर्भ में बच्चा मौजूद नहीं था. इस मामले में सवाल उठता है कि ऑपरेशन से पहले अस्पताल ने महिला की गर्भावस्था की स्वतंत्र रूप से पुष्टि क्यों नहीं की? बीबीसी ने मेडिकल विशेषज्ञों से बात करके इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश की है. इस्लामाबाद में पाकिस्तान इस्लामिक मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर फ़ज़ल रबी कहते हैं, ''किसी भी सर्जरी से पहले आम तौर पर मरीज़ की मेडिकल जांच की जाती है और उसकी मेडिकल हिस्ट्री ली जाती है. इसके बाद सर्जरी की ज़रूरत और बीमारी की सही पहचान की पुष्टि के लिए मरीज़ की हालत के मुताबिक़ ज़रूरी टेस्ट और जांच की जाती है. इनमें ब्लड टेस्ट, इमेजिंग और दूसरी ज़रूरी जांच शामिल हो सकती हैं.'' उनका कहना था कि सर्जरी से पहले एनेस्थीसिया देने के लिए भी मरीज़ की मेडिकल स्थिति का आकलन किया जाता है. ब्लड प्रेशर, नब्ज़, ऑक्सीजन लेवल और दूसरी ज़रूरी चीज़ें भी जांची जाती हैं. डॉक्टर फ़ज़ल रबी ने आगे कहा कि सभी ज़रूरी जांच के बाद मरीज़ से सर्जरी के लिए सहमति भी ली जाती है. ''किसी भी गर्भावस्था में सबसे पहले सामान्य प्रसव को प्राथमिकता दी जाती है. लेकिन कुछ गंभीर परिस्थितियों में ऑपरेशन करना पड़ता है.'' उनका कहना था कि आम तौर पर डॉक्टर महिला की जांच करके यह पता लगा लेते हैं कि सामान्य प्रसव संभव है या नहीं. इसके बाद अपनी तसल्ली के लिए अल्ट्रासाउंड कराया जाता है. ''सी-सेक्शन यानी बच्चे की डिलीवरी के लिए ऑपरेशन करने से पहले डॉक्टर महिला की पूरी मेडिकल जांच करता है. इस जांच से डॉक्टर को मां और बच्चे की स्थिति के बारे में काफ़ी जानकारी मिल जाती है.'' ''डॉक्टर महिला के पेट की भी जांच करता है. इससे गर्भाशय का आकार, बच्चे की संभावित स्थिति और गर्भावस्था की कुल स्थिति का अंदाज़ा लगाया जाता है. बच्चे की मौजूदगी और उसकी हालत जानने के लिए उसके दिल की धड़कन भी जांची जाती है.'' उनका कहना था कि अगर मेडिकल जांच या पहले से मौजूद मेडिकल रिकॉर्ड से गर्भावस्था, बच्चे की स्थिति या किसी जटिलता को लेकर शक हो, तो डॉक्टर ज़रूरत के मुताबिक़ अल्ट्रासाउंड या दूसरे ज़रूरी मेडिकल टेस्ट करा सकते हैं. कराची की पुलिस सर्जन डॉक्टर समिया ने भी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा कि उनकी चिंता यह नहीं है कि महिला ने अपनी गर्भावस्था के बारे में ग़लत जानकारी क्यों दी. असली सवाल यह है कि ''महिला का कथित झूठ सी-सेक्शन की पूरी प्रक्रिया होने तक कैसे और क्यों सामने नहीं आया?'' उन्होंने कहा, ''मेडिकल साइंस में मरीज़ को नुक़सान न पहुंचाना एक बुनियादी सिद्धांत है. लेकिन इस मामले में एक बार फिर हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की हक़ीक़त सामने आ गई है.'' डॉक्टर समिया के मुताबिक, सी-सेक्शन ऐसा ऑपरेशन नहीं है जिसका फ़ैसला सिर्फ़ एक रिपोर्ट देखकर कर लिया जाए. इसके लिए कई प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं. इनमें कई दस्तावेज़ तैयार करना, मरीज़ की मेडिकल जांच करना और अलग-अलग टेस्ट के नतीजों की जांच करना शामिल है. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi

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