दरगाह के मेले से लेकर गणपति उत्सव तक: 20 सालों से शोर के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने वालीं सुमैरा अब्दुलाली
"कुछ सेकंड का तेज़ शोर भी जानलेवा हो सकता है. यह कोई धार्मिक मुद्दा नहीं है, यह शोर और स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है." मुंबई में 'आवाज़ फ़ाउंडेशन' की संस्थापक सुमैरा अब्दुलाली कहती हैं. उन्होंने आगे बताया, "लाउडस्पीकरों के शोर के कारण मुसलमानों की ओर से मस्जिदों के ख़िलाफ़ और ईसाइयों द्वारा चर्चों के ख़िलाफ़ शिकायतें दर्ज कराने की घटनाएं भी सामने आई हैं." महाराष्ट्र में ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा गरमा-गरम बहस का विषय है, पुणे और विद्यानंद बापट में गणेश उत्सव के दौरान डीजे के इस्तेमाल को लेकर विवाद चल रहा है. सुमैरा पिछले दो दशकों से इस मुद्दे पर काम कर रही हैं. वो न केवल आवाज़ें रिकॉर्ड करती हैं, बल्कि जनता और अधिकारियों को उनके बारे में सूचित भी करती हैं और जागरूकता पैदा करती हैं. उन्हीं जैसे कार्यकर्ताओं और नागरिकों के प्रयासों के कारण मुंबई में लाउडस्पीकर और डीजे के उपयोग पर प्रतिबंधों को अधिक सख़्ती से लागू किया जाने लगा. इस संबंध में बॉम्बे हाई कोर्ट के 2016 के आदेश को अब दस साल हो चुके हैं. सुमैरा का कहना है कि ध्वनि प्रदूषण की समस्या का समाधान आज तक नहीं हुआ है. इसके विपरीत, शोर बढ़ता जा रहा है, लेकिन लोग इसके प्रति अधिक जागरूक भी हो रहे हैं. भारत के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और विश्व स्वास्थ्य संगठन की कार्यकारी समिति के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर हर्षवर्धन कान, नाक और गले के विशेषज्ञ हैं. उन्होंने अक्सर उल्लेख किया है कि भारत श्रवण हानि की समस्या का सामना कर रहा है. इसके पीछे के कारण भी सभी को ज्ञात हैं. हमने सुमैरा से उन कारणों और समाधानों के बारे में बात की. पिछले 25 सालों में उन्होंने ध्वनि प्रदूषण के ख़िलाफ़ लड़ाई में बड़ी सफलता हासिल की है, और कई बार उन्हें मौखिक हमलों और आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा है. सुमैरा और उनके सहयोगियों को अक्सर भीड़भाड़ वाली जगहों पर ऑडियोमीटर (ध्वनि स्तर मापने वाले उपकरण) हाथ में लिए हुए नोट्स लेते हुए देखा जाता है, ख़ासकर त्योहारों, सभाओं और जुलूसों के दौरान, जब शोर का स्तर अधिक होता है. इसीलिए कुछ लोग उन्हें 'श्रवण मीटर वाली महिला' या मुंबई की 'शोर मंत्री' कहते हैं. इमेज स्रोत, Karen Dias via Getty Images सुमैरा का कहना है कि ध्वनि प्रदूषण पर काम शुरू करना संयोगवश ही हुआ था. उनके रिश्तेदार साद अली बॉम्बे एनवायरनमेंटल एक्शन ग्रुप (बीईएजी) के अध्यक्ष थे, जो एक पर्यावरण संगठन है. साद अली और उनके एक अन्य रिश्तेदार, प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी डॉ. सलीम अली, कुछ अन्य पर्यावरणविदों के साथ इस संगठन से जुड़े हुए थे. सुमैरा कहती हैं, "साद अली तब बूढ़े थे, उन्हें काम में मदद की ज़रूरत थी. मेरे बच्चे उस समय छोटे थे, लेकिन मुझे लगा कि उनकी देखभाल करते हुए मुझे कुछ सार्थक करना चाहिए, इसलिए मैंने उनकी मदद करना शुरू कर दिया." उनसे प्रेरित होकर सुमैरा ने काम शुरू किया लेकिन उन शुरुआती दिनों में ध्वनि प्रदूषण के मुद्दे पर ज़्यादा चर्चा नहीं होती थी. सुमैरा कहती हैं, "पच्चीस साल पहले, अगर भारत में कोई ध्वनि प्रदूषण के बारे में बात करता या शोर से परेशान होने की शिकायत करता, तो लोग उसे पागल कह देते थे." भारत में ध्वनि प्रदूषण के बारे में जागरूकता 1990 के दशक में बढ़ने लगी और 1999 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दिशानिर्देश जारी किए. भारत में, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने वर्ष 2000 में ध्वनि प्रदूषण के संबंध में नियम जारी किए . इस उद्देश्य के लिए गठित समिति में साद अली भी शामिल थे. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. बीईएजी टीम ने इस आदेश को लागू कराने के लिए 2002 में बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की. एक साल के भीतर ही अदालत ने इस मामले पर अपना पहला आदेश पारित करते हुए साइलेंस ज़ोन में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया. स्कूलों और अस्पतालों जैसी जगहों पर इन नियमों का सख्ती से पालन किया गया. सुमैरा कहती हैं, "उसके बाद, लोग फ़ोन करने लगे. जब मैंने आदेश लागू करवाने के लिए उनके घरों पर जाना शुरू किया, तब मुझे इस मुद्दे की गंभीरता का एहसास हुआ. मुझे लगा कि कोई और इस मुद्दे को नहीं उठा रहा है, इसलिए मैंने फ़ैसला किया कि मुझे कुछ करना होगा." बाद में, यह सुमैरा के लिए पूर्णकालिक नौकरी बन गई. वो रेत खनन से संबंधित मुद्दों पर भी काम कर रही थीं. पहले न केवल आम जनता बल्कि पुलिस भी शोर से संबंधित नियमों से अक्सर अनजान रहती थी. उन्होंने इस बारे में जानकारी उपलब्ध कराने और जागरूकता पैदा करने का काम शुरू किया, और यहीं से 2008 में 'आवाज़ फ़ाउंडेशन' की स्थापना हुई. सुमैरा कहती हैं, "उस समय लोग आलोचना करते थे, 'शोर की चिंता सिर्फ़ सुमैरा को है, बाकी हमें कोई समस्या नहीं है. तो हमें उसकी बात क्यों सुननी चाहिए?' इसीलिए हमने इस काम को संस्थागत रूप देने का फैसला किया." मूल नियमों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रात 10 बजे की सीमा थी. सुमैरा कहती हैं, "लेकिन यह सीमा राजनीतिक और देर रात की गतिविधियों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए समस्याग्रस्त थी. इसलिए 2002 में नियमों में बदलाव किया गया." एक बदलाव किया गया है ताकि डेसिबल सीमा का पालन करते हुए साल में पंद्रह दिनों तक आधी रात तक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किया जा सके. सुमैरा ने उस संशोधन के ख़िलाफ़ जनहित याचिका भी दायर की. वह संशोधन रद्द तो नहीं हुआ, लेकिन यह मुद्दा गरमागरम बहस का विषय बन गया और शोरगुल की कई शिकायतें पुलिस के पास आने लगीं. सुमैरा बताती हैं, "2005 में, सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश आया था. यह आदेश चेन्नई में एक लड़की के साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले में था, जिसमें लाउडस्पीकर की वजह से उसकी मदद की गुहार अनसुनी रह गई थी." उस समय न्यायालय ने स्वीकार किया था कि ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति और शांति मौलिक अधिकारों का हिस्सा हैं. न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि धर्म ध्वनि नियमों का उल्लंघन करने का कारण नहीं हो सकता. सुमैरा की क़ानूनी लड़ाई भी हाई कोर्ट में शुरू हुई. 'आवाज़ संगठन' ने यातायात और निर्माण कार्य के शोर के ख़िलाफ़ याचिकाएं दायर कीं. डॉ. महेश बेडेकर और अन्य लोगों ने भी याचिकाएं दायर कीं. न्यायमूर्ति अभय ओक की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2016 में उच्च न्यायालय में इन सभी याचिकाओं पर सर्वसम्मति से एक आदेश पारित किया. यह स्पष्ट करते हुए कि धार्मिक स्थलों और किसी भी कार्यक्रम में लाउडस्पीकर के उपयोग के लिए अनुमति आवश्यक है, उन्होंने मौन क्षेत्रों में लाउडस्पीकर की अनुमति पर रोक लगा दी. उसके बाद मुंबई में ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों को और अधिक सख्ती से लागू किया जाने लगा. सुमैरा ने बताया कि ध्वनि के बारे में बात करते समय प्रौद्योगिकी के इतिहास को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. "शुरुआत में लाउडस्पीकर बहुत महंगे होते थे, केवल धनी लोग ही उन्हें ख़रीद सकते थे. इसलिए, लाउडस्पीकर का उपयोग प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया. निम्न आय वर्ग के लोग भी उनकी नक़ल करने की इच्छा रखते थे." सुमैरा बताती हैं कि जैसे-जैसे तकनीक सस्ती होती गई, उसका उपयोग बढ़ता गया. "अगर वे कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं कर सकते?" वाली सोच उभरने लगी और ध्वनि प्रदूषण सभी धर्मों के लिए एक समस्या बन गया. "मैंने ईद-ए-मिलाद के दौरान भिंडी बाज़ार में डेसिबल स्तर मापा. वहां भी शोर का स्तर काफ़ी अधिक था. मुझे केवल रंगों में अंतर नज़र आया: ईद के आयोजनों में हरे रंग और विभिन्न प्रतीकों का उपयोग किया जाता है; गणपति के दौरान नारंगी रंग, विभिन्न प्रतीकों और झंडों का उपयोग किया जाता है." "अब स्थिति 'पहले आप, पहले आप' जैसी हो गई है. पहले कौन रुकेगा? यही सवाल है, हर कोई एक दूसरे को धमकाने की कोशिश कर रहा है." इस दौरान सुमैरा को दो बार दुर्व्यवहार, धमकियों और भीड़ के हमलों का सामना करना पड़ा. "मैं 2018 में माहिम दरगाह के पास लगे मेले के दौरान और फिर कुछ साल बाद गणपति के दिनों में रात 1 बजे आवाज़ों को मांप रही थी." उन्होंने धमकी देने वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई है और मामला फ़िलहाल मुंबई की एक अदालत में लंबित है. "यह काम का हिस्सा है. कुछ लोग आपके साथ होंगे, कुछ आपके ख़िलाफ़; और आपको इसे स्वीकार करने के लिए तैयार रहना होगा." 2019 में, मुंबई सरकार और गणेश मंडलों ने डीजे का उपयोग बंद करने का निर्णय लिया. "कुछ छोटे समूहों में अपवाद हो सकते हैं, लेकिन बड़े समूहों ने डीजे का उपयोग बंद कर दिया है और मैंने स्वयं इसकी जाँच की है. लेकिन डीजे न होने पर भी, ढोल और ताशा का उपयोग किया जाता है." सुमैरा कहती हैं कि कई लोगों को लगता है कि ढोल-ताशा डीजे से बेहतर है. लेकिन अगर डेसिबल के हिसाब से देखें तो दोनों के ध्वनि स्तर में ज़्यादा अंतर नहीं है. "अक्सर, जब कोई पारंपरिक ड्रम सेट होता है, तो उसके साथ एक लाउडस्पीकर भी लगा होता है. इससे ड्रम की आवाज़ की तीव्रता बढ़ जाती है और वह दूर तक सुनाई देती है. लाउडस्पीकर न होने पर भी, कुछ ड्रम सेट की आवाज़ आस-पास के क्षेत्र में तेज़ होती है, लेकिन वह दूर तक नहीं जाती." सुमैरा बताती हैं कि लाउडस्पीकर के अलावा ध्वनि प्रदूषण के अन्य स्रोत भी हानिकारक हैं. उनका कहना है कि आजकल डीजे और बूमबॉक्स शोर, कंपन, प्रकाश प्रदूषण और लेज़र किरणों के हानिकारक प्रभावों को बढ़ा रहे हैं, जो नुकसानदायक हो सकते हैं. शोर, भारतीय शहरों का एक अभिन्न अंग है, खासकर मुंबई जैसे शहरों में. "इन दिनों मुंबई में निर्माण कार्य निस्संदेह सबसे बड़ा कारण है, क्योंकि यह पूरे साल चलता रहता है. हानिकारक शोर एक मिनट के लिए भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. लेकिन त्योहारों के दौरान, शोर एक निश्चित समयावधि के लिए होता है, और अब अक्सर समय सीमा का सख्ती से पालन किया जाता है." हालांकि, निर्माण कार्य महीनों तक चलता रहता है और शोर पर कोई नियंत्रण नहीं होता. खासकर ड्रिलिंग से होने वाला शोर बेहद परेशान करने वाला होता है. सुमैरा कहती हैं, "निर्माण के लिए खुदाई करते समय, जब ड्रिल को बाहर निकाला जाता है और सफाई के लिए घुमाया जाता है, तो धातु के धातु से टकराने का शोर स्तर 120 डेसिबल तक पहुंच सकता है." "डेवलपर्स निर्माण से पैसा कमाते हैं और वे कम शोर वाले उपकरणों का उपयोग नहीं करना चाहते या उनकी सफाई के अतिरिक्त खर्चों को वहन नहीं करना चाहते." "हम यह नहीं कह रहे हैं कि किसी को त्योहारों, निर्माण कार्यों या अन्य गतिविधियों को रोकना चाहिए. लेकिन हम बस इतना कह रहे हैं कि उपलब्ध तकनीक का उपयोग करें और शोर को दूसरों पर बोझ न बनने दें." केवल डेसिबल स्तर मापना ही पर्याप्त नहीं है, क्योंकि घनी आबादी वाले शहरों में, बंद स्थानों और कंक्रीट के कारण शोर की तीव्रता कई गुना बढ़ जाती है. यहां तक कि शांत जगह पर मोबाइल फोन की धीमी आवाज़ भी कुछ समूहों के लिए कष्टदायक हो सकती है. सुमैरा जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि शहर का निर्माण करते समय इन बातों पर विचार किया जाना चाहिए. "लोगों को यह कहकर गुमराह किया जा रहा है कि यह कुछ दिनों तक काम करेगा. अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति और पुलिस का सहयोग हो तो शोर के स्तर को नियंत्रित करना मुश्किल नहीं होगा." "मैं बहुत आशावादी और सकारात्मक हूं. मुझे सच में उम्मीद है कि इतने सारे लोगों के इस मुद्दे पर बात करने, एक साथ आने और इसके लिए अपनी आवाज़ उठाने से आवश्यक राजनीतिक दबाव बनेगा." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi