दिल्ली में चुनाव आयोग की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया जारी रखने के ख़िलाफ़ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और अन्य संगठनों ने शनिवार को प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन को रोकने के लिए की गई सख़्ती ने न केवल पुलिस के वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारियों, बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया है. सबसे बढ़कर, पुलिस की सख़्ती का व्यापक पैमाना राजनीतिक सवाल खड़े कर रहा है. पुलिस की कड़ी कार्रवाई से भी ज्यादा सवाल इस बात पर उठ रहे हैं कि इतने बड़े स्तर पर बंदोबस्त क्यों किया गया. करीब 20 हज़ार प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए करीब 35 हज़ार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था. इनमें दिल्ली पुलिस के अलावा कई अन्य सुरक्षा बलों के जवान भी शामिल थे. लोगों की आवाजाही को पूरी तरह नियंत्रित करने के लिए दिल्ली मेट्रो के 50 से अधिक स्टेशन बंद कर दिए गए थे. देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली आने और यहां से जाने वाली क़रीब 245 ट्रेनों में देरी हुई या उन्हें दिल्ली में प्रवेश करने से रोक दिया गया. अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को गिरफ़्तार करने के लिए महिला पुलिस अधिकारियों ने जिस तरह पुलिस टीम का नेतृत्व करते हुए विमान में प्रवेश किया, उस पर भी सवाल उठ रहे हैं. दीपके बार-बार कह रहे थे कि उनका गिरफ़्तारी का विरोध करने का कोई इरादा नहीं है और पुलिस को जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. बीबीसी न्यूज़ हिंदी को कई पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने बताया कि विरोध प्रदर्शन के पैमाने की तुलना में पुलिस की सख़्ती पूरी तरह अनुपातहीन थी. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. कर्नाटक के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसटी रमेश ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, "पुलिसिंग के अलग-अलग तरीके होते हैं, लेकिन मौजूदा कार्रवाई राजनीतिक फ़ैसलों को दर्शाती है. मैंने बिहार में एक रेलवे स्टेशन पर फंसे लोगों की तस्वीर देखी, क्योंकि उनकी ट्रेन रद्द कर दी गई थी. इसलिए इसका असर सिर्फ दिल्ली पर नहीं, बल्कि पूरे देश पर पड़ा." बीबीसी न्यूज़ हिंदी ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक यशोवर्धन आज़ाद से भी इस बारे में बात की. उनके मुताबिक, पुलिस आयुक्त को अपने राजनीतिक वरिष्ठों के सामने यह आकलन रखना चाहिए था कि प्रदर्शनकारियों पर सख्त पाबंदियां लगाई जाएंगी और उनके उल्लंघन पर कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने एसटी रमेश की इस बात से सहमति जताई कि पुलिस आयुक्त को राजनीतिक विचारों से प्रभावित या निर्देशित होने के बजाय स्वतंत्र रूप से फैसले लेने चाहिए थे. आजाद ने कहा, "जेन-ज़ी के युवाओं को अपनी भावनाएं ज़ाहिर करने के लिए ऐसी जगह दी जानी चाहिए थी, जो जंतर-मंतर से भी बड़ी हो. हुआ यह है कि नीट में सुधार का मुद्दा गायब हो गया है. पुलिस की बर्बरता के कारण प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच दुश्मनी पैदा हो गई है. इससे विवाद के बातचीत के जरिए किसी भी तरह के समाधान की संभावना खत्म हो जाती है." हालांकि, वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारियों ने एक दूसरा नज़रिया भी पेश किया. उन्होंने कहा कि स्थिति का आकलन करने के लिए सबसे सही व्यक्ति वही अधिकारी होता है, जो मौके पर मौजूद हो. नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बात करने वाले एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी ने कहा, "ज़मीनी स्तर पर स्थिति का आकलन करने का कोई दूसरा तरीका नहीं हो सकता. ज़मीनी स्तर पर आकलन गलत था या राजनीतिक दबाव के कारण ऐसा किया गया, इसका आकलन करना मुश्किल है." जेन-ज़ी के साथ हालिया टकराव में बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों की तैनाती को राजनीतिक विश्लेषक जुलाई में नीट परीक्षाओं में गंभीर चूक के ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शनों में युवाओं के बड़ी संख्या में शामिल होने पर सरकार की हैरानी के तौर पर देख रहे हैं. उन प्रदर्शनों के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था. उस समय स्थिति संभालने में मिली नाकामी के कारण इस बार तुरंत और सख्ती से कार्रवाई करने का तरीका अपनाया गया लगता है. राजनीतिक विश्लेषक राधिका रामासेशन ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, "इस पीढ़ी को समझना बिल्कुल अलग तरह की चुनौती है. उनकी आकांक्षाएं हैं, पिछली पीढ़ी की तुलना में उनका नज़रिया बहुत अलग है. बीजेपी उनकी उम्मीदों और राजनीति के प्रति उनके नज़रिए को समझ नहीं पाई है." राजनीतिक टिप्पणीकार आरती जेरथ ने रामासेशन के इस आकलन से आंशिक सहमति जताई कि सरकार ने परीक्षा में हुई गड़बड़ियों पर लोगों की प्रतिक्रिया को कम करके आंका था. जेरथ ने कहा, "जब जुलाई में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे, तो सरकार घबरा गई और उसने पैलेट गन का इस्तेमाल शुरू कर दिया. इससे यह एक बड़ा आंदोलन बन गया. इस बार सरकार दूसरे छोर पर चली गई. उसने ज़रूरत से ज्यादा सख़्त प्रतिक्रिया दी और दिल्ली में दहशत का माहौल बना दिया." वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक आनंद सहाय ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, "सरकार को छात्रों से बातचीत करके राजनीतिक संदेश देना चाहिए था. इसके बजाय प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पश्चिम बंगाल में दो उपचुनावों में जीत का जश्न मना रहे थे, जहां मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए थे और राज्य के चुनावों के बाद जोड़े गए थे." सहाय ने कहा कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के देश में आपातकाल लागू करने से पहले जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन के दौरान भी "विरोधियों के साथ बातचीत के लिए हमेशा राजनीतिक रास्ता खुला रहता था. लोगों के विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार को किसी भी स्तर पर कभी नहीं रोका गया." राधिका रामासेशन ने कहा कि राहुल गांधी और कांग्रेस के विरोध प्रदर्शनों ने एक तरह से जगाने का काम किया. उन्होंने कहा, "राजनीतिक दलों को संसद के अंदर या बाहर विरोध प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है. लेकिन राहुल गांधी ने सीधे टकराव का रास्ता चुना. सैद्धांतिक रूप से बीजेपी नेतृत्व जुलाई की तरह प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर सकता था. लेकिन इस बार दरवाज़े पूरी तरह बंद कर दिए गए. साफ़ है कि चुनाव आयोग सरकार के इशारे पर काम कर रहा था. वरना चुनाव आयोग ने कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात क्यों नहीं की?" जेरथ का मानना है कि सरकार को किसी न किसी मोड़ पर अपनी रणनीति तय करनी होगी. उन्होंने कहा, "दिल्ली में दिन-ब-दिन दहशत का माहौल नहीं बना रह सकता. मुंबई को देखिए, जहां प्रदर्शनकारियों की शुरुआती कोशिशों को सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद भी पुलिस ने प्रदर्शन रोकने के लिए कुछ नहीं किया. वहां हुआ प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण साबित हुआ. सरकार या पुलिस यह नहीं समझती कि प्रेशर कुकर का दबाव कम करने के लिए भाप निकलने देना जरूरी था." रामासेशन का मानना है कि राजनीतिक रूप से स्थिति जटिल हो गई है. उन्होंने कहा, "नीट का मुद्दा जाति और सांप्रदायिक सीमाओं से परे था. लेकिन आम तौर पर लोग एसआईआर को ऐसा मुद्दा मानते हैं, जिसका असर दूसरे समुदायों की तुलना में अल्पसंख्यकों और दलितों पर शायद ज्यादा पड़ता है. इसलिए संभव है कि बीजेपी के वे मुख्य मतदाता, जो नीट परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने से बहुत नाराज थे, मौजूदा सख्त रुख के लिए सरकार की सराहना कर सकते हैं." उन्होंने आगे कहा, "अगर कुछ बदला है, तो वह यह कि टकराव के मोर्चे और सख्त हो गए हैं. निकट भविष्य में इनके बीच की खाई पाटे जाने की उम्मीद नहीं है. सरकार के लिए और खासकर प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह के लिए दांव पर यह लगा है कि वे अपना बेहद सख्त रुख बनाए रखें. जुलाई में इस रुख को झटका लगा था." हालांकि, सख्ती और सीजेपी नेतृत्व की गिरफ्तारी के बावजूद, आनंद सहाय ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि युवा दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में पहुंचकर विरोध प्रदर्शन करने और पुलिस के हाथों गिरफ्तार होने में कामयाब रहे. उन्होंने कहा, "इसका श्रेय उन्हें दिया जाना चाहिए कि यह बिना नेतृत्व वाला आंदोलन था, क्योंकि उनके सभी नेताओं को पुलिस पहले ही उठा चुकी थी." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi