अटलांटिक महासागर में ट्रिस्टन दा कुन्हा नाम का एक छोटा-सा द्वीप है. वहां ज्वालामुखी फटने के बाद सभी 264 लोगों को अपना घर छोड़कर जाना पड़ा. इसके बाद इन लोगों ने कुछ समय ब्रिटेन में बिताया. वहां उन्होंने पहली बार आधुनिक दुनिया को देखा. बाद में उन्होंने अपने ये अनुभव बीबीसी के साथ साझा किए. साल 1963 में प्रसारित बीबीसी के एक कार्यक्रम में टिम ब्रिंटन ने कहा था, "एक साल पहले तक इन लोगों ने न तो सड़क देखी थी, न कोई गाड़ी और न ही छोटी-सी झोपड़ी से ऊंचा कोई मकान." वह ट्रिस्टन दा कुन्हा के लोगों के बारे में बता रहे थे. इसे दुनिया का सबसे दूर-दराज़ का द्वीप कहा जाता है. दक्षिण अटलांटिक महासागर के बीच मौजूद यह छोटा-सा ब्रिटिश द्वीप दक्षिण अफ़्रीका के केपटाउन और ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो से लगभग बराबर दूरी पर है. लोगों की आबादी वाली दूसरी जगहों से यह 1,500 मील से भी ज़्यादा दूर है. यहां पहुंचने के लिए नाव से सात दिन का सफ़र करना पड़ता है. लेकिन 10 अक्तूबर 1961 को ज्वालामुखी फटने के बाद द्वीप के लोगों की शांत और दुनिया से कटी हुई ज़िंदगी अचानक बदल गई. उन्हें उद्योगों और मशीनों वाली आधुनिक दुनिया में जाना पड़ा. साल 1998 में बीबीसी की बनाई एक वीडियो में द्वीप के एक व्यक्ति ने कहा, "पहले ज़मीन के अंदर से आवाज़ें आने लगीं. इसके बाद ज़मीन अपने आप फट गई. फिर ज़मीन से धुआं और आग निकलने लगी." द्वीप पर रहने वाली मैरी स्वेन ने उस पल को याद करते हुए बताया कि वह दौड़कर अपने पति के पास गईं और चिल्लाईं, "फ़्रेड, जल्दी उठो. ज़मीन फट रही है." ट्रिस्टन दा कुन्हा में लोगों को बसे हुए 150 साल हो चुके थे. इस दौरान वहां का ज्वालामुखी कभी नहीं फटा था. लेकिन इस बार मुख्य बस्ती से कुछ सौ मीटर की दूरी पर ज़मीन में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई थीं. इस बस्ती का नाम एडिनबरा ऑफ़ द सेवन सीज़ था. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. द्वीप के लोग मछली पकड़ने वाली नावों में बैठकर पास के नाइटिंगेल द्वीप पहुंचे. तब तक लावा उनके घरों के लिए ख़तरा बन चुका था. बीबीसी के एक संवाददाता ने उस समय बताया था, "भूकंप के कारण पूरा इलाक़ा हिल रहा था. द्वीप का पूरा पूर्वी हिस्सा फटता जा रहा था." ट्रिस्टन दा कुन्हा में रहने वाले सभी 264 लोगों को द्वीप खाली करना पड़ा. अगले ही दिन संयोग से नीदरलैंड्स का एक जहाज़ वहां पहुंचा और सभी लोगों को अपने साथ ले गया. इन लोगों ने अपने साथ केवल उतना ही सामान लिया, जितना वे ले जा सकते थे. बाक़ी सब कुछ द्वीप पर ही छोड़ना पड़ा. मैरी स्वेन ने बताया कि वह अपने साथ केवल "एक बंदूक, एक ओवरकोट और एक लैम्प" ले गई थीं. मछली पकड़ने वाली उनकी नावें भी कुछ हफ़्तों बाद उनके साथ इंग्लैंड पहुंचीं. वहां उन्होंने इन नावों को अपने घरों के बगीचों में रखा. इन लोगों को इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर बसे बंदरगाह शहर साउथैम्पटन के पास एक पुराने हवाई अड्डे पर ठहराया गया. उस समय इस हवाई अड्डे का इस्तेमाल नहीं हो रहा था. ब्रिंटन ने बताया था, "इन लोगों के लिए यहां की हर चीज़ नई थी. उनके द्वीप पर पैसों का इस्तेमाल नहीं होता था. इसलिए उन्होंने कभी दुकानें भी नहीं देखी थीं." "नावें ही उनकी रोज़ी-रोटी का सहारा थीं. औद्योगिक क्रांति का उनकी ज़िंदगी पर कोई असर नहीं पड़ा था. वे 150 साल से दुनिया में हो रहे बदलावों से दूर रहकर खेती पर आधारित ज़िंदगी जी रहे थे." साल 1506 में पुर्तगाल के एक नौसैनिक अधिकारी ने इस द्वीप को खोजा था और इसे अपना नाम दिया था. इसके बाद करीब 300 साल तक समुद्री पक्षियों और सील के अलावा वहां कोई दूसरा जीव रहने नहीं आया. साल 1816 में ब्रिटेन ने इस द्वीप को अपने कब्ज़े में ले लिया. ब्रिटेन को डर था कि दक्षिण अटलांटिक महासागर के सेंट हेलेना द्वीप पर कैद नेपोलियन बोनापार्ट को छुड़ाने की कोशिश करने वाले लोग ट्रिस्टन दा कुन्हा को अपना ठिकाना बना सकते हैं. इसे रोकने के लिए ब्रिटेन ने द्वीप को अपने कब्ज़े में लिया था. अगले साल जब ब्रिटिश सैनिकों को वहां से वापस बुलाया गया तो स्कॉटलैंड के कॉर्पोरल विलियम ग्लास वहीं रुक गए. उन्होंने अपने परिवार और कुछ दूसरे लोगों के साथ मिलकर द्वीप पर पहली स्थायी बस्ती बसाई. साल 1961 तक 40 वर्ग मील में फैले इस द्वीप की आबादी बढ़कर 264 हो गई थी. इनमें से कई लोग ऐसे परिवारों से थे, जिनके सदस्य द्वीप के पास समुद्री हादसों का शिकार हुए जहाज़ों से बचकर निकले थे. द्वीप की पूरी आबादी में केवल सात उपनाम थे. कई बार आलू की फ़सल ख़राब होने या मछली पकड़ने वाली नावें टूट जाने के कारण द्वीप के लोग भूख से मरने की कगार तक पहुंच गए थे. इसके बावजूद उन्होंने द्वीप नहीं छोड़ा. ब्रिटिश सरकार ने कई बार उन्हें द्वीप से कहीं और बसाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने हर बार इनकार कर दिया. ज्वालामुखी फटने के बाद उन्हें इंग्लैंड जाना पड़ा. वहां द्वीप के लोगों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा. इससे पहले उन्होंने कभी कार, साइकिल, टेलीविज़न या आयकर का फ़ॉर्म तक नहीं देखा था. इंग्लैंड के मौसम के साथ तालमेल बैठाना भी उनके लिए मुश्किल था. ट्रिस्टन के रहने वाले जोई रेपेटो ने साल 1963 में बीबीसी से कहा था, "यहां गैस और धुआं बहुत ज़्यादा है." उन्होंने बताया कि जब उन्हें पहली बार रहने की जगह ले जाया जा रहा था तो वह "लगातार खांस रहे थे." खेती और मछली पकड़कर गुज़ारा करने वाले इन लोगों को हर दिन एक ही समय पर काम शुरू करना, एक ही जगह जाना और एक ही काम करना भी मुश्किल लगा. जोई के पिता जेराल्ड ने बताया कि उनके द्वीप पर ज़िंदगी प्रकृति के हिसाब से बदलती रहती थी. लेकिन इंग्लैंड में हर दिन एक ही काम करना पड़ता था और तय समय के मुताबिक़ चलना पड़ता था. पैसों की ज़रूरत भी उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव था. स्वेन ने बताया, "इंग्लैंड में रहने के लिए पैसा चाहिए, लेकिन ट्रिस्टन में ऐसा नहीं है. अगर आपके पास पैसा नहीं है तो उसकी चिंता करने की ज़रूरत नहीं पड़ती." "मेरे पास पैसा न हो, तब भी मैं अपने खेत में आलू उगा सकती हूं और मछलियां पकड़ सकती हूं." उन्होंने ब्रिटेन की ज़िंदगी को लेकर अपनी नाराज़गी भी खुलकर ज़ाहिर की. उन्होंने कहा, "हमें यहां का मौसम पसंद नहीं है. यहां बीमारियां बहुत ज़्यादा हैं. हमें यह जगह बिल्कुल पसंद नहीं है." द्वीप पर ब्रिटिश वर्दी पहनने वाला केवल एक पुलिसकर्मी था. इसके बावजूद वहां लगभग कोई अपराध नहीं होता था. लेकिन इंग्लैंड में दो युवकों ने द्वीप के एक व्यक्ति पर हमला कर दिया. उन्होंने उसे घायल कर दिया और उसकी कीमती सोने की घड़ी छीनकर तोड़ दी. इस घटना से द्वीप के लोग बहुत दुखी और हैरान हुए. हालांकि, उन्हें ब्रिटेन की ज़िंदगी की कुछ चीज़ें अच्छी भी लगीं. ख़ासकर युवा वहां की कुछ चीज़ों को पसंद करने लगे. उन्हें इटली में बने सूट और रिकॉर्ड प्लेयर पसंद आए. एक युवक ने बताया कि उसे जॉनी कैश और अर्नेस्ट टब के गानों वाला कंट्री एंड वेस्टर्न संगीत पसंद था. उन्होंने नाचने के कार्यक्रमों में भी हिस्सा लिया. उन्होंने ट्विस्ट और लोकोमोशन जैसे डांस सीखे. हालांकि, उनका कहना था कि वे वाल्ट्ज करना भूल गए थे. इसके बावजूद द्वीप के ज़्यादातर लोग अपने घर वापस जाना चाहते थे. साल 1962 में ब्रिटिश सरकार ने ट्रिस्टन दा कुन्हा के हालात की जांच करने के लिए एक टीम भेजी. उस समय भी ज्वालामुखी से धुआं निकल रहा था. फिर भी ज्वालामुखी और ज़मीन का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया कि वह दोबारा शांत हो गया है. ज्वालामुखी फटने से एडिनबरा ऑफ़ द सेवन सीज़ गांव को बहुत ज़्यादा नुकसान नहीं हुआ था. आख़िरी समय में लावा ने अपना रास्ता बदल लिया और समुद्र में बह गया. द्वीप के लोगों ने इसे भगवान की कृपा माना. घास-फूस से बने कुछ घरों की छतें जल गई थीं, लेकिन ज़्यादातर घर सुरक्षित थे. हालांकि, लोगों के वहां नहीं रहने के दौरान कुछ नाविक द्वीप पर आए थे. उन्होंने कुछ घरों को नुकसान पहुंचाया और कुछ जानवर चुरा लिए. इसके बावजूद बहुत से जानवर बच गए थे. मुर्गियों की संख्या और बढ़ गई थी. कुत्तों ने कुछ भेड़ों को मार दिया था. लेकिन गाय और दूसरे पशु द्वीप की हरी घास खाकर स्वस्थ थे. वहां नए बछड़े भी पैदा हुए थे. लावा ने समुद्र के किनारों को ढक दिया था. इसके बावजूद यह साफ़ हो गया था कि लोग द्वीप पर वापस जा सकते हैं. ब्रिटिश अधिकारियों ने उस पुराने हवाई अड्डे के कम्युनिटी हॉल में गुप्त मतदान कराया, जहां द्वीप के लोग कुछ समय के लिए रह रहे थे. ट्रिस्टन के 21 साल से ज़्यादा उम्र के सभी लोगों ने वोट दिया. कुल 148 लोगों ने अपने द्वीप पर लौटने के पक्ष में वोट दिया. केवल पांच लोगों ने इसका विरोध किया. पहले कुछ लोगों को द्वीप पर भेजा गया. उन्होंने अगले साल होने वाली आलू की फ़सल के लिए बीज लगाए. इसके बाद नवंबर 1963 में द्वीप के ज़्यादातर लोग ट्रिस्टन दा कुन्हा वापस पहुंच गए. बीबीसी ने स्वेन से पूछा कि द्वीप पर लौटने के बाद वह क्या करेंगी. उन्होंने जवाब दिया, "आज़ादी से जिएंगे. वहां हम ख़ुद मछलियां पकड़ सकते हैं. बिना पैसे के भी अपनी ज़रूरत की हर चीज़ हासिल कर सकते हैं." एलेन रेपेटो का जन्म ट्रिस्टन दा कुन्हा में हुआ था. उन्होंने साल 1984 में यह द्वीप छोड़ दिया था. साल 1998 में उन्होंने बीबीसी को बताया कि ट्रिस्टन दा कुन्हा लोगों को अपनी ओर इतना क्यों खींचता है. उन्होंने कहा, "हमें अपने दम पर जीने की आदत है. हम प्रकृति का सामना करते हुए ज़िंदगी गुज़ारना जानते हैं." "हमें एक-दूसरे पर उस तरह निर्भर रहना पड़ता है, जैसा दुनिया की ज़्यादातर जगहों पर देखने को नहीं मिलता." उन्होंने यह भी बताया कि साल 1961 की घटना ने लोगों की ज़िंदगी पर क्या असर डाला था. एलेन रेपेटो ने कहा, "आज भी ज्वालामुखी से निकलने वाला धुआं हमें उन घटनाओं की याद दिलाता है. उन घटनाओं ने अपने बारे में हमारी सोच और बाहरी दुनिया के साथ हमारे रिश्ते को बदल दिया था." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.
स्रोत: BBC Hindi