Regd. UDYAM-UP-31-0004031
प्रदेश के तेजी से उभरते हुए जनसंवाद समाचार न्यूज चैनल व न्यूज पोर्टल पर अपने व्यवसाय व शिक्षण संस्थान के तेजी से आगे बढ़ोत्तरी के लिए प्रचार प्रसार कराकर लाभ प्राप्त करने के लिए सम्पर्क करें। सम्पर्क सूत्र 9506980980

गुजरात: दिवाली से पहले लाखों मज़दूर सूरत क्यों छोड़ रहे हैं?

इमेज स्रोत, Santosh Kumar/Hindustan Times via Getty Images "मैं सूरत में हर दिन 13 घंटे काम करता था. इसके बदले मुझे महीने के 19,500 रुपये मिलते थे. पूरे हफ़्ते में एक दिन भी छुट्टी नहीं मिलती थी." "अगर छुट्टी लेता था तो उस दिन का वेतन काट लिया जाता था. इसलिए मैं चार दिन पहले अपने घर बिहार लौट आया. अब वापस सूरत कब जाऊंगा, यह तय नहीं है." ये शब्द 19 साल के वीर साहनी के हैं. उन्होंने दो साल तक सूरत की एक एम्ब्रॉयडरी फ़ैक्ट्री में काम किया था. हफ़्ते में एक दिन भी छुट्टी नहीं मिलने से परेशान होकर वह बिहार के सीतामढ़ी में अपने घर लौट गए. पिछले कुछ दिनों में सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर बड़ी संख्या में उत्तर भारत के मज़दूर अपने घर जाते दिखाई दिए हैं. कुछ लोगों ने कहा कि वे छठ पूजा और दिवाली मनाने के लिए घर जा रहे हैं. वहीं, कुछ लोगों ने माना कि सूरत की फ़ैक्ट्रियों में काम करने के कथित हालात की वजह से वे अपने घर लौट रहे हैं. क़रीब ढाई महीने पहले सूरत की एम्ब्रॉयडरी यूनिटों में काम करने वाले मज़दूरों ने हफ़्ते में एक दिन की छुट्टी अनिवार्य करने की मांग को लेकर आंदोलन किया था. इस उद्योग में काम करने वाले लगभग सभी लोग प्रवासी मज़दूर हैं. इनमें से ज़्यादातर बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड से काम करने के लिए सूरत आते हैं. मज़दूरों की शिकायत थी कि एम्ब्रॉयडरी यूनिटों में उन्हें हर दिन 12 घंटे की शिफ़्ट में काम करना पड़ता है और हफ़्ते में एक भी छुट्टी नहीं मिलती. अगर वे हफ़्ते में एक दिन छुट्टी लेते हैं तो उस दिन का वेतन काट लिया जाता है. दूसरी ओर, फ़ैक्ट्री मालिकों का कहना है कि जब मज़दूर नौकरी शुरू करते हैं तो उनके सामने पहले ही यह शर्त रख दी जाती है कि उन्हें 12 घंटे काम करना होगा और हफ़्ते में वेतन के साथ एक भी छुट्टी नहीं मिलेगी. इसी शर्त के आधार पर उनका वेतन तय किया जाता है. इसलिए अगर अब उन्हें हफ़्ते में एक दिन छुट्टी दी जाती है तो उस दिन का वेतन नहीं मिलेगा. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. बिहार के रहने वाले वीर साहनी ने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की है. उन्होंने बीबीसी से कहा, "अभी मैं छठ पूजा के लिए घर आया हूं. यहां हमें रोज़गार नहीं मिलता. इसलिए आख़िर में मुझे गुजरात वापस जाना ही पड़ेगा." वह कहते हैं कि सूरत में उन्हें फ़ैक्ट्री में ही रहने की जगह मिल जाती है, लेकिन खाने का ख़र्च उन्हें ख़ुद उठाना पड़ता है. वीर साहनी के मुताबिक़, महीने के 19,500 रुपये के वेतन में से उनके क़रीब नौ हज़ार रुपये ख़र्च हो जाते हैं. कमलेश यादव की स्थिति भी वीर साहनी जैसी है. वह कहते हैं, "मेरे साथ काम करने वाले कई मज़दूर अपने गांव लौट गए हैं. मेरी कंपनी में भी एम्ब्रॉयडरी की 14 मशीनें बंद हैं और 16 मशीनें चल रही हैं." कमलेश अभी अपने घर नहीं गए हैं क्योंकि वह नौकरी छोड़ने की स्थिति में नहीं हैं. वह 12 घंटे काम करते हैं और उन्हें 18 हज़ार रुपये से थोड़ा ज़्यादा वेतन मिलता है. उन्होंने बीबीसी से कहा, "पिछले एक हफ़्ते में बड़ी संख्या में मज़दूर अपने घर चले गए हैं. फ़ैक्ट्री में बिजली चली जाए तो भी फ़ैक्ट्री मालिक छुट्टी कर देते हैं और उस दिन का वेतन काट लिया जाता है." वह कहते हैं कि उन्हें विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं है. अगर वे किसी प्रदर्शन में शामिल होते हैं तो उनका वेतन काट लिया जाता है या उन्हें छुट्टी पर भेज दिया जाता है. इमेज स्रोत, Karunesh Ranpariya/FB क़रीब ढाई महीने पहले सूरत की एम्ब्रॉयडरी यूनिटों में काम करने वाले मज़दूरों ने हफ़्ते में एक दिन की छुट्टी अनिवार्य करने की मांग को लेकर आंदोलन किया था. इस उद्योग में काम करने वाले लगभग सभी लोग प्रवासी मज़दूर हैं. इनमें से ज़्यादातर बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड से काम करने के लिए सूरत आते हैं. मज़दूरों की शिकायत थी कि एम्ब्रॉयडरी यूनिटों में उन्हें हर दिन 12 घंटे की शिफ़्ट में काम करना पड़ता है और हफ़्ते में एक भी छुट्टी नहीं मिलती. अगर वे हफ़्ते में एक दिन छुट्टी लेते हैं तो उस दिन का वेतन काट लिया जाता है. दूसरी ओर, फ़ैक्ट्री मालिकों का कहना है कि जब मज़दूर नौकरी शुरू करते हैं तो उनके सामने पहले ही यह शर्त रख दी जाती है कि उन्हें 12 घंटे काम करना होगा और हफ़्ते में वेतन के साथ एक भी छुट्टी नहीं मिलेगी. इसी शर्त के आधार पर उनका वेतन तय किया जाता है. इसलिए अगर अब उन्हें हफ़्ते में एक दिन छुट्टी दी जाती है तो उस दिन का वेतन नहीं मिलेगा. बिहार के रहने वाले वीर साहनी ने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की है. सूरत के वेदांत इंडस्ट्रियल पार्क की एक एम्ब्रॉयडरी यूनिट में काम करने वाले सूर्योदय सिंह ने बीबीसी से कहा, "जब कोई मज़दूर फ़ैक्ट्री में काम शुरू करता है तो उसके वेतन या छुट्टियों को लेकर कोई लिखित समझौता नहीं होता. केवल ज़ुबानी बातचीत होती है." "कुछ जगह आधार कार्ड की कॉपी मांगी जाती है, जबकि कई बार उसकी भी ज़रूरत नहीं पड़ती. इसलिए हर कारीगर का वेतन अलग-अलग हो सकता है." वह कहते हैं, "इतनी लड़ाई लड़ने के बाद 30 सितंबर को एक सर्कुलर दिखाकर कहा गया कि हफ़्ते में एक दिन की छुट्टी देने पर सहमति बन गई है." "लेकिन बाद में फ़ैक्ट्री मालिकों ने कहा कि अगर हफ़्ते में वेतन के साथ एक दिन की छुट्टी चाहिए तो न्यूनतम वेतन पर काम करना होगा." "इसलिए अब कई मज़दूर फ़ैक्ट्री मालिकों की मनाही के बावजूद रविवार को छुट्टी करते हैं और उस दिन का वेतन गंवा देते हैं. कुछ मज़दूरों ने एम्ब्रॉयडरी यूनिटों में काम करना ही बंद कर दिया है." सूरत की एक जीआईडीसी में एम्ब्रॉयडरी यूनिट चलाने वाले बिपिनभाई अकबरी ने बीबीसी से कहा, "पिछले 20 से 25 साल से सूरत की सभी इंडस्ट्री में इसी तरह काम होता है. कारीगरों को 12 घंटे काम करना होता है और उन्हें वेतन के साथ हफ़्ते में कोई छुट्टी नहीं मिलती." वह कहते हैं, "कारीगरों को नौकरी पर रखते समय वेतन या छुट्टी को लेकर कोई लिखित समझौता नहीं होता. इसकी वजह यह है कि एक ही जगह दो-तीन महीने तक काम करने वाले कारीगर बहुत कम होते हैं." "ज़्यादातर कारीगर कुछ दिन काम करने के बाद जहां अच्छा वेतन मिलता है, वहां दूसरे मालिक के पास चले जाते हैं. उन्हें बार-बार अपने घर भी जाना पड़ता है. इसलिए एक ही जगह लंबे समय तक काम करने वाले कारीगर बहुत कम होते हैं." उनका दावा है, "अभी जिस तरह की प्रतिस्पर्धा चल रही है और कारीगरों के वेतन बढ़ गए हैं, उसमें उन्हें छुट्टी देना एम्ब्रॉयडरी यूनिट के मालिकों के लिए संभव नहीं है." मज़दूरों को हफ़्ते में एक दिन की छुट्टी के अधिकार पर सूरत के सहायक श्रम आयुक्त एसएस दुबे ने कहा, "नए लेबर कोड के मुताबिक़, मज़दूरों को हफ़्ते में एक दिन की छुट्टी का अधिकार है. यह कोई नई बात नहीं है. पुराने श्रम क़ानूनों में भी वेतन के साथ एक दिन की छुट्टी का प्रावधान था." वह कहते हैं, "नए श्रम क़ानूनों के मुताबिक़, मज़दूर को हर दिन आठ घंटे और हफ़्ते में छह दिन काम करना होता है." "फ़ैक्ट्री मालिक उससे 12 घंटे की ड्यूटी भी करा सकता है, लेकिन ऐसी स्थिति में उससे हफ़्ते में 48 घंटे से ज़्यादा काम नहीं कराया जा सकता." "इसका मतलब है कि अगर किसी मज़दूर को हर दिन 12 घंटे काम करना पड़ता है तो वह हफ़्ते में केवल चार दिन काम करेगा, इससे ज़्यादा नहीं. इसका उल्लंघन होने पर ज़िम्मेदार व्यक्ति के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा सकती है." कपड़ा उद्योग में मज़दूरों के काम के घंटों और वेतन को लेकर विवाद चल रहा है. इस बीच मज़दूर संगठन इंटक से जुड़े शरद झघड़े का कहना है कि ज़्यादातर मज़दूर उन राज्यों से आते हैं, जहां रोज़गार की कमी है. इसके अलावा कई मज़दूरों ने क़र्ज़ लिया हुआ है. इसलिए उनके पास नौकरी जारी रखने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं होता. उन्होंने कहा, "सूरत में इस समय स्थिति मुश्किल है. क़रीब ढाई महीने से मज़दूर हफ़्ते में एक दिन की छुट्टी के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. यहां मज़दूरों के अपने घर नहीं हैं. वे किराये के मकानों में रहते हैं." "कई मज़दूर महीने में 30 से 40 हज़ार रुपये कमाते थे. हाल में कलेक्टर के सर्कुलर के ज़रिए हफ़्ते में एक दिन की छुट्टी की उनकी मांग भी मान ली गई है." "इसके बाद एम्ब्रॉयडरी यूनिटों के संगठन 'तेजस' ने घोषणा की कि अब आठ घंटे की शिफ़्ट कराई जाएगी और न्यूनतम वेतन के मुताबिक़ ही वेतन दिया जाएगा. इसके अलावा मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी गई है." "अगर इस घोषणा को लागू किया जाता है तो जो मज़दूर 30 से 35 हज़ार रुपये कमाते थे, उनकी महीने की आमदनी घटकर 15 से 16 हज़ार रुपये रह जाएगी." "मज़दूरों के लिए इतनी कम आमदनी में गुज़ारा करना संभव नहीं है. इसलिए वे सूरत छोड़कर जा रहे हैं." वह कहते हैं कि कुछ दिनों में त्योहार आने वाले हैं. इसलिए कम आमदनी में सूरत में रहने के बजाय मज़दूर अपने घर जाना पसंद कर रहे हैं. शरद झघड़े के मुताबिक़, "मज़दूरों का आंदोलन शुरू होने से पहले ही शहर में 30 से 40 प्रतिशत मज़दूरों की कमी थी. अब यह कमी और गंभीर हो जाएगी." "इस बीच फ़ैक्ट्री मालिकों की क़र्ज़ की किस्तें जारी हैं. इसलिए इस विवाद में दोनों पक्षों को नुक़सान हो रहा है." शरद कहते हैं कि एम्ब्रॉयडरी उद्योग में काम करने वाले मुश्किल से दो प्रतिशत मज़दूर ही अपना घर ख़रीद पाए होंगे. बाक़ी सभी लोग किराये के घरों में रहते हैं. मज़दूर वर्ग के 70 प्रतिशत लोग क़र्ज़ में डूबे हैं. वे अपने गांवों में भी लंबे समय तक नहीं रह सकते. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

स्रोत: BBC Hindi