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1970 के दशक का तेल संकट क्या था, क्या मौजूदा हालात उससे भी बुरे हैं?

इमेज स्रोत, James Pozarik/Liaison via Getty Images दुनिया की ऊर्जा सप्लाई के लिए एक अहम समुद्री रास्ता एक महीने से बंद है. इससे यह चेतावनी मिली है कि ये दुनिया 1970 के दशक के तेल संकट से भी बड़े संकट की ओर बढ़ सकती है. शिपिंग एक्सपर्ट और मर्स्क के पूर्व डायरेक्टर लार्स येनसेन ने बीबीसी से कहा कि अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच युद्ध का असर 1970 के दशक के आर्थिक संकट से "काफ़ी ज़्यादा बड़ा" हो सकता है. उनकी यह टिप्पणी इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के प्रमुख फ़तीह बिरोल की चेतावनी के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि दुनिया "इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा सुरक्षा ख़तरे का सामना कर रही है." उन्होंने बीबीसी से कहा, "यह 1970 के दशक के तेल के दामों के झटकों से भी बड़ा है. यह रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद गैस की क़ीमतों में आए उछाल से भी बड़ा है." हालांकि स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ का बंद होना वैश्विक सप्लाई को प्रभावित कर रहा है, लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि आज की दुनिया पहले से ज़्यादा मज़बूत है. बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें अर्थशास्त्री और क्रिस्टोल एनर्जी की चीफ़ एग्ज़ीक्यूटिव डॉ. कैरल नखले ने बीबीसी को बताया कि 1970 के दशक का तेल संकट आज के संकट से "पूरी तरह से अलग" था, क्योंकि उस समय पहला तेल झटका "एक सोचे-समझे पॉलिसी फ़ैसले का नतीजा" था. अक्तूबर 1973 में अरब तेल उत्पादक देशों ने योम किप्पुर युद्ध के दौरान इसराइल का समर्थन करने वाले अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले कई देशों के समूह पर प्रतिबंध लगा दिया था. साथ ही इस नीति के तहत तेल उत्पादन भी कम कर दिया गया था. नखले कहती हैं, "इसका असर यह हुआ कि कुछ ही महीनों में तेल की क़ीमतें लगभग चार गुना बढ़ गईं." इससे तेल इस्तेमाल करने वाले बड़े देशों में तेल की राशनिंग शुरू हो गई, और नखले ने कहा कि इससे "वैश्विक आर्थिक और वित्तीय संकट" शुरू हो गया, जिसका लंबे समय तक असर पड़ने वाला था. क्वीन्स यूनिवर्सिटी बेलफ़ास्ट के रिसर्चर डॉ. टिएरनन हीने ने कहा कि तेल की ऊंची क़ीमतों ने हर जगह महंगाई को बढ़ावा दिया, "मतलब बिज़नेस और कम हो गए और बेरोज़गारी बढ़ गई." उन्होंने कहा, "इसका बहुत बड़ा असर हुआ, जिससे कई देशों के सामाजिक ताने-बाने को नुक़सान पहुंचा, बड़े पैमाने पर हड़तालें हुईं, अशांति हुई और ग़रीबी बढ़ी, क्योंकि कई परिवारों को गुज़ारा करने के लिए संघर्ष करना पड़ा." अमेरिका और ब्रिटेन दोनों में 1973 से 1975 तक मंदी रही और इस संकट की वजह से 1974 में टेड हीथ की कंज़र्वेटिव सरकार गिर गई. मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. अमेरिका और इसराइल के एक महीने पहले ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू करने के बाद से स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से जहाज़ों की आवाजाही लगभग बंद हो गई है. इससे खाड़ी देशों से तेल, गैस और अन्य ज़रूरी चीज़ों की सप्लाई प्रभावित हुई है, जो आम तौर पर दुनिया के क़रीब पांचवें हिस्से (लगभग 20%) के तेल का निर्यात करते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खाड़ी से तेल की सप्लाई फिर शुरू कराने के लिए कई तरीक़े अपनाए हैं- जैसे सहयोगी देशों से युद्धपोत भेजने को कहना और ईरान को चेतावनी देना कि अगर जहाज़ों को सुरक्षित रास्ता नहीं मिला तो उस पर और कड़े हमले किए जाएंगे. लेकिन येनसेन जो अब वेस्पुची मैरीटाइम नाम की कंसल्टेंसी चलाते हैं, उन्होंने बीबीसी के टुडे कार्यक्रम में कहा कि जो तेल एक महीने से ज़्यादा पहले खाड़ी से निकला था, वही अभी दुनिया की रिफ़ाइनरियों तक पहुंच रहा है और यह सप्लाई जल्द ही रुक जाएगी. उन्होंने कहा, "जो तेल की कमी हम अभी देख रहे हैं, वह आगे और बढ़ेगी, भले ही कल ही होर्मुज़ स्ट्रेट खुल जाए." "हमें बहुत ज़्यादा ऊर्जा लागत का सामना करना पड़ेगा, सिर्फ़ इस संकट के दौरान नहीं, बल्कि इसके ख़त्म होने के बाद भी 6 से 12 महीने तक." नखले, जो अरब एनर्जी क्लब की सेक्रेटरी जनरल भी हैं, उनका कहना है कि 1970 के दशक के मुक़ाबले तेल का बाज़ार ज़्यादा अलग-अलग तरह का है, जबकि इस्तेमाल होने वाले तेल की कुल मात्रा में भी काफ़ी कमी आई है. उनका मानना है कि भले ही अभी क़ीमतें ज़्यादा हैं, लेकिन आज का संकट उतना गंभीर नहीं है. वो कहती हैं, "हालांकि मात्रा के हिसाब से जो रुकावट हम देख रहे हैं वह काफी बड़ी है, शायद हाल के इतिहास में सबसे बड़ी है लेकिन मार्केट 1970 के दशक की तुलना में कहीं ज़्यादा मज़बूत है." "यह ज़्यादा विविध है, तेल पर कम निर्भर है और इसमें बेहतर सुरक्षा उपाय और आपातकालीन व्यवस्था मौजूद हैं." लेकिन नैटिक्सिस सीआईबी में कमोडिटी रिसर्च के डायरेक्टर जोएल हैनकॉक ने कहा कि एक और ज़रूरी अंतर यह था कि 1970 का संकट विकसित देशों को टारगेट कर रहा था, जिनके पास इसे मैनेज करने के लिए पैसा और "पॉलिटिकल पावर" थी. वो कहते हैं कि आज का संकट मुख्य रूप से विकासशील देशों को प्रभावित कर रहा है, "जिनके पास इसे संभालने के लिए मज़बूत संस्थाएं और आर्थिक क्षमता नहीं है." उन्होंने यह भी कहा कि इस बार ऊर्जा ढांचे को होने वाला नुक़सान भी एक बड़ा फ़र्क है, जो 1970 के संकट में नहीं था. उनके मुताबिक़, "यह संकट तभी ख़त्म होगा जब युद्ध की तीव्रता कम होगी." डॉक्टर हीने ने कहा कि आज कुछ अंतर हैं जो दुनिया के पक्ष में काम करते हैं, जिसमें हमारी अर्थव्यवस्थाओं की बेहतर समझ और ज़्यादा देशों के पास तेल भंडार होना शामिल है. उन्होंने कहा, "सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि अगर यह संकट लंबा चलता है, तो भविष्य को लेकर उम्मीदें और ख़राब हो जाएंगी." "सबसे अच्छा यही होगा कि इस झगड़े को जल्द से जल्द ख़त्म किया जाए और कुछ हद तक स्थिरता वापस लाई जाए." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

स्रोत: BBC Hindi