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इसराइल ने रिपोर्ट को बताया पक्षपातपूर्ण, जस्टिस मुरलीधर ने दिया ये जवाब

"बहुत सारे लोग सवाल करते हैं कि आपने रिपोर्ट तैयार करने में इसराइली सैनिकों से बात नहीं की. इसराइली सैनिकों ने तो ख़ुद बात की, सिर्फ़ हमसे नहीं, पूरी दुनिया से. उन्होंने बच्चे को मारकर उस पर गर्व करते हुए वीडियो बनाया." यह शब्द हैं, भारत के जाने माने न्यायविद और ओडिशा हाई कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस एस मुरलीधर के, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग के अध्यक्ष के रूप में ग़ज़ा में इसराइली सैन्य अभियानों पर एक अहम रिपोर्ट पेश की है. इस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि इसराइल ने ग़ज़ा में फ़लस्तीनी बच्चों को जानबूझकर और सुनियोजित तरीक़े से निशाना बनाया है. आयोग का निष्कर्ष है कि इन हमलों का मक़सद ग़ज़ा में फ़लस्तीनी समूह के भविष्य और उनके अस्तित्व को ख़त्म करना था. हालांकि इसराइल ने इस रिपोर्ट को ख़ारिज किया है. अपने चार दशक के लंबे कार्यकाल में जस्टिस मुरलीधर ओडिशा हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के पद से रिटायर हुए. उसके बाद उन्होंने वकील के तौर पर दोबारा प्रैक्टिस शुरू की. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सीनियर एडवोकेट डेजिग्नेट किया है. मानवाधिकार परिषद ने नवंबर 2025 यानी पिछले साल उनको एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग का प्रमुख नियुक्त किया था. इस जांच की रिपोर्ट पूर्वी यरूशलम समेत क़ब्ज़े वाले फ़लस्तीनी इलाक़े और इसराइल पर है. जस्टिस मुरलीधर से रिपोर्ट जुड़ी तमाम बातों और इसके अलग-अलग पहलुओं पर बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित ने उनसे बात की. वे कहते हैं कि फ़लस्तीन के बच्चे ये महसूस न करें कि जब वो तकलीफ़ में थे तब दुनिया सो रही थी. वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं. जस्टिस एस मुरलीधर का मानना है कि इसराइल की रणनीति यह है कि फ़लस्तीनी संगठन ख़त्म हो जाएं. उनका कहना है कि इसराइली डिटेंसन में फ़लस्तीनी बच्चों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा राज्य की ओर से सुनियोजित ढंग से किया गया हमला है. हमने उनसे पूछा कि क्या इसके पक्ष में कोई सबूत है जो इसे साबित करता हो या क्या उन्होंने इसराइल से इसका विवरण मांगा था? उन्होंने कहा, "बिल्कुल, बिल्कुल. मैं बार-बार यही कहना चाहता हूँ कि ये पूरी रिपोर्ट इसराइल को ड्राफ़्ट फ़ॉर्म में भेजी. हमने उनसे कहा कि हम ग़ज़ा में जाना चाहते हैं. क़ब्ज़े वाले फ़लस्तीनी इलाक़े में जाना चाहते हैं, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया." उनका कहना है कि अगर इसराइली अधिकारियों के पास ऐसा कोई प्रमाण है, जो हमें मिली जानकारी के विपरीत है तो इसे पेश कर सकते हैं. उनकी ताज़ा रिपोर्ट में , "हिंसा और फ़लस्तीनी बच्चों के ख़िलाफ़ अपराधों की जांच की गई है." ये सारी घटनाएं सात अक्तूबर 2023 से शुरू हुईं, जब हमास ने इसराइल पर मिसाइल हमला किया था. इस हमले में 1200 लोगों की मौत हुई थी और 250 से ज़्यादा लोगों को बंधक बना लिया गया था. इसके जवाब में इसराइल ने हमास के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान शुरू किया था. हमास के नियंत्रण वाले स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़, उसके बाद से इसराइल के हमलों में अब तक 73 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 21 हज़ार बच्चे भी शामिल हैं. हमास के इन आंकड़ों को संयुक्त राष्ट्र भी भरोसेमंद मानता है. इसराइली हमलों में फ़लस्तीनी बच्चों की मौत की तस्वीरें कई बार सामने आईं. इसके साथ ही ग़ज़ा में इसराइली हमलोंं में लोगों की मौत और शहर के मलबों में दिखा कि ग़ज़ा की तस्वीर किस तरह से बदल चुकी है. जस्टिस मुरलीधर कहते हैं, "बच्चों की सुरक्षा के लिए व्यापक तौर पर तीन क़ानून हैं. इनमें एक है- अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून. इसके अंदर मानवाधिकारों की यूनिवर्सल घोषणा के साथ ही अन्य संधियां और व्यवहार आते हैं, जिनमें बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा भी शामिल है. "दूसरा अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून है, जिसके अंदर जेनेवा कन्वेंशन आता है. यह बताता है कि युद्ध के समय इसमें शामिल देशों के आचरण कैसा होना चाहिए. जैसे कि किसी ने सफ़ेद झंडा दिखा दिया तो उस पर गोली नहीं चलाई जाएगी." इसी के तहत एंबुलेंस पर हमला नहीं करना भी शामिल है. वे कहते हैं, "ये सभी मानवीय क़ानून के अंदर आते हैं और यह बताता है कि क़ब्ज़ा करने वाले की ज़िम्मेदारी क्या है.'' जस्टिस मुरलीधर कहते हैं, "इस मामले में तीसरा क़ानून है- अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल लॉ. इन तीनों क़ानूनों में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि बच्चों के लिए ख़ास स्थिति है. बच्चे वैध निशाना नहीं हैं." बीबीसी ने जस्टिस मुरलीधर से पूछा कि क्या आयोग ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने में कोई ख़ास तरीक़ा अपनाया? इसके लिए कितने गवाहों से बात की गई? और क्योंकि वे ग़ज़ा में ज़मीनी स्तर पर नहीं पहुंच पाए तो जिनसे बात की गई, वे कौन थे? जस्टिस मुरलीधर ने कहा, "बिल्कुल. आपका सवाल सही है, लेकिन आयोग जांच करने वाली संस्था है यह कोई न्यायिक संस्था नहीं है. यह फ़ैसले नहीं करता है...और किसी भी नैरेटिव के दो हमेशा दो पक्ष होते हैं. एक वह होता है जो पीड़ित है और दूसरा वह है, जो हमलावर है. हमने इसके लिए बहुत सारे ओपन सोर्सेस पर भरोसा किया है. " उन्होंने बताया, "हमने पीड़ितों, चश्मदीदों, बच्चों और जो इलाज के लिए ग़ज़ा से बाहर निकलने में कामयाब हुए उनके निजी बयान, फ़ॉरेंसिक सबूतों, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और पत्रकारों के सबूत लिए हैं. जस्टिस मुरलीधर का कहना है कि जिन डॉक्टरों ने ग़ज़ा में लोगों का इलाज किया, उन्होंने अपनी आंखों से जो देखा, उसे भी रिपोर्ट का आधार बनाया गया है. वे बताते हैं, "हम केवल एक स्रोत पर भरोसा नहीं कर सकते थे. हमने पैरा आठ और दस (रिपोर्ट के) में अपनी प्रक्रिया का विस्तार से ज़िक्र किया है. एक ही जानकारी की हम कई तरीक़ों से पुष्टि की." जस्टिस मुरलीधर कहते हैं, हर घटना का एक कालक्रम होता है. उसकी कोई भौगोलिक स्थिति होती है, साथ ही सैटलाइट से ली गई तस्वीरें होती हैं. उससे हम घटनास्थल को तय करते हैं. इसके लिए इसराइली सैनिकों के लोकेशन पर भी गौर किया गया कि क्या घटना के समय उनकी वहां मौजूदगी संभव है." वे बताते हैं, "हमारी टीम में एक सैन्य विश्लेषक भी हैं, जो हथियारों, जंगी सामान, सेना की योजना का अध्ययन करते हैं. इस आयोग में जेंडर एक्सपर्ट, फ़ॉरेंसिक साइबर क्राइम एक्सपर्ट समेत 12 लोग शामिल हैं." उन्होंने बताया कि बहुत से लोग आयोग को अपने वीडियो या ऑडियो क्लिप या तस्वीरें भेजते हैं. इसके बाद आयोग उन्हीं सबूतों को जांच के दायरे में लेता है जो भरोसेमंद हो और जिनकी पुष्टि कर पाना संभव हो. इसके बावजूद आप कह सकते हैं कि हमने इसराइली सरकार से बात नहीं की, इसराइली सेना या इसराइल के लोगों से बात नहीं की. तो मेरा जवाब यह है कि हम हर बार रिपोर्ट का जो ड्राफ़्ट तैयार करते हैं वो पहले ही इसराइली सरकार को भेजते हैं." जस्टिस मुरलीधर का कहना है, "वो ड्राफ़्ट को अंतिम रूप देने से पहले कह सकते थे कि 'हमने ये-ये बात ग़लत कही है या और इससे जुड़े अन्य सबूतों को हमें देखना था.' लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया." जस्टिस मुरलीधर ने बताया कि उन्होंने फ़लस्तीनी अधिकारियों को भी ड्राफ़्ट भेजा था और उनकी टिप्पणी के बाद अपनी रिपोर्ट में कुछ सुधार भी किए. उन्होंने बताया, "इसके अलावा जब रिपोर्ट तैयार हो रही थी, तभी मैंने ख़ुद आयोग का अध्यक्ष होने के नाते इसराइली अधिकारियों को नोट भेजा कि हम आपसे मिलना चाहते हैं, आपके लोगों से मिलना चाहते हैं और ग़ज़ा जाना चाहते हैं, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है." वो कहते हैं , "इसराइली सैनिक ख़ुद अपना वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं. एक ने कहा कि उसने 16 साल के बच्चे को मारा है. वीडियो में वह ख़ुद इस बात को स्वीकार कर रहा है और लोग इसे देख सकते हैं." "तो ये जो बहुत सारे लोग कहते हैं कि हमने इसराइली सेना से बात नहीं की. इसराइली सेना ने तो पूरी दुनिया से बात की. इस बात पर गर्व करते हुए कि उसने किसी बच्चे को मारा है." इस रिपोर्ट में इसराइल के डिप्टी स्पीकर निसिम वतूरी का ज़िक्र किया गया है, जिन्होंने सात अक्तूबर की घटना के बाद 9 अक्तूबर को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था. जस्टिम मुरलीधर कहते हैं, "उन्होंने पोस्ट में लिखा कि ग़ज़ा को मिटा दो, इसके अलावा किसी बात से हमें संतुष्टि नहीं होगी और यह कि वहां एक बच्चे तक को मत छोड़ो, अंत में बाक़ी बचे सभी लोगों को निकाल दो ताकि वे फिर से ना उठ सकें." जस्टिस मुरलीधर कहते हैं, "सोच देखिए... 30 जनवरी 2025 को वे दोबारा ये कहते हैं कि 'ग़ज़ा आतंकवादियों से भरा हुआ है और जो बच्चा वहां जन्म लेता है, वह जन्म के समय से ही आतंकवादी है." "उनके अन्य राजनेताओं की सोच भी लोगों के सामने मौजूद है, आप उसे इंटरनेट पर देख सकते हैं और उन्हें किसी ने नकारा नहीं है." जस्टिस मुरलीधर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "इसराइली अधिकारियों ने हमारी रिपोर्ट के ख़िलाफ़ 18 पेज का एक खंडन तैयार किया और उसे लोगों के बीच प्रसारित किया है. उन्होंने यह हमें नहीं भेजा है लेकिन हम पर आरोप लगाया है कि हम 'भेदभाव और पक्षपात' कर रहे हैं. जस्टिस मुरलीधर कहते हैं, "अगर इसराइल के पास कोई सबूत है जो हमारी रिपोर्ट को ग़लत बताता है, तो वे अब भी इसे पेश कर सकते हैं." बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

स्रोत: BBC Hindi