जब वह अपना तंबूरा लिए मंच पर उतरतीं तो लगता कि एक-एक कर महाभारत के पात्र सांस लेने लगे हैं और पूरा मंच कुरुक्षेत्र में बदल चुका है. पंडवानी का वह प्राचीन आलाप जब उनके कंठ से निकलता तो वह लोक और लय का ऐसा संगम बन जाता, जिसमें इतिहास सांस लेने लगता था. आज वह तंबूरा मौन है. पंडवानी की कथा थम गई है. पंडवानी की आत्मा तीजन बाई, दुनिया के रंगमंच से विदा ले चुकी हैं. उनके जाने से जैसे छत्तीसगढ़ की मिट्टी ने अपनी सबसे प्रिय आवाज़ खो दी है और समय के विराट रंगमंच पर एक गहरा, लंबा सन्नाटा उतर आया है. छत्तीसगढ़ के अटारी गांव की मिट्टी से उठी एक आदिवासी लड़की, जिसने बरसों न तो बड़े मंच देखे थे, न रोशनी की चकाचौंध लेकिन उसकी आवाज़ ने उन्हें नया मुकाम दिया. तीजन बाई ने पंडवानी को घर-आंगन की चौपालों से निकालकर विश्व के मंचों तक पहुंचा दिया. वो लंबे समय से बीमार चल रही थीं. कुछ दिनों पहले उन्हें गंभीर हालत में रायपुर के एम्स में भर्ती किया गया था, जहां उन्होंने शनिवार को देर रात अंतिम सांस ली. इमेज स्रोत, K Asif/The India Today Group via Getty Images तीजन बाई के तंबूरे के हर सुर में लोक की आत्मा धड़कती थी और उनके अभिनय में महाभारत का हर पात्र देह और प्राण पा लेता था. वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं. द्रौपदी की करुण पुकार, भीम का अदम्य बल, अर्जुन की बेचैनी और कृष्ण की रहस्यमयी मुस्कान, सब कुछ उनके स्वर में बसता था. वो केवल महाभारत की कथा नहीं कहती थीं, वो लोक की स्मृति गाती थीं. तंबूरे को कंधे पर गदा की तरह टिका कर जब वो भीम के प्रसंग सुनातीं तो लगता जैसे व्यक्ति के भीतर कोई भीम जाग उठा हो. पंडवानी के मंच से वो सिर्फ कहानी नहीं सुनाती थीं, वो इतिहास की जकड़ी हुई आवाज़ों को मुक्त करती थीं. उनकी पंडवानी केवल एक लोककला नहीं रही, वह एक संवाद बन गई, जहां इतिहास, स्त्री, संघर्ष और संगीत एक साथ बोलते थे. मंच पर जब तीजन बाई होतीं, तो दर्शक महज़ दर्शक नहीं रहते, वे भी कथा का हिस्सा बन जाते. यही लोककला को लोकजीवन से जोड़ देने की उनकी जादूगरी थी. उन्होंने पंडवानी को केवल बचाया नहीं, उसे एक नई पहचान दी. उन्होंने साबित किया कि लोककला की ताक़त किसी सीमित मंच की मोहताज नहीं, वह तो दिलों में गूंजने वाली शाश्वत कथा है. छत्तीसगढ़ के छोटे गांव से लेकर पेरिस तक जब उन्होंने पंडवानी गाई, तो श्रोताओं ने भाषा नहीं, आत्मा सुनी. पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण जैसे सम्मान उनके गले के अलंकार बन गए, पर तीजन बाई की सादगी कभी नहीं बदली, वो जीवन भर लोक की बेटी बनी रहीं. आज जब वह तंबूरा निःशब्द पड़ा है तो लगता है कि उनकी अनुपस्थिति में जैसे एक युग का आलाप थम गया है. यह लगभग तीस साल पुरानी बात है. वो गर्मियों के दिन थे, जब भिलाई के सेक्टर 1 वाले घर में फ़र्श पर पुराने कपड़े और साड़ियों को जोड़ कर वो अपने नाती-पोते के सोने के लिए सुई-धागे से कथरी सिल रही थीं. मैं सवाल पूछता जा रहा था और वो अपने सहज, शांत स्वर में जवाब देती जा रही थीं. मैंने उनसे पूछा कि अब जबकि दुनिया भर में आपका इतना नाम हो चुका है, तब भिलाई इस्पात संयंत्र में चतुर्थ श्रेणी की कर्मचारी के बतौर काम करना, लोगों को पानी पिलाना क्या ठीक लगता है? उन्होंने कथरी सिल रहे हाथों को रोका और धीरे से जवाब दिया, "मैं मिठाई खाती हूं, तब भी जली हुई रोटी की याद मुझे हमेशा बनी रहती है." सांस्कृतिक आयोजनों पर निर्भर रहने वाली तीजन बाई को 7 जुलाई 1986 को भारत सरकार के उपक्रम भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी मिली थी. हालांकि वो इस बात से संतुष्ट थीं कि उन्हें कम से कम स्थाई तौर पर, हर महीने एक निश्चित वेतन तो मिलेगा. 1956 में दुर्ग के अटारी गांव में जन्मीं तीजन बाई ने, 13 साल की उम्र में पहली बार चंदखुरी गांव में पंडवानी का सार्वजनिक प्रदर्शन किया था और उसके बाद फिर तीजन, पंडवानी में ही रम गईं. उनके पिता छुनुक राम बांस बजाते थे और मां सुखवती बांस गीत गाती थीं. घर में तीन बहनें और एक भाई थे, और सबसे बड़ी तीजन थीं. छत्तीसगढ़ में तीन-चार फुट लंबे बांस को बजाते हुए साथ का गायक उसके सुरों पर कहानी कहता जाता है. ज़ाहिर है, तीजन बाई को गाना-बजाना विरासत में मिला. हालांकि तीजन से छोटी दोनों बहनें- खेदा और छुटकी या भाई शेरा ने संगीत का रास्ता नहीं चुना. तीजनबाई कहती थीं, "ग़रीबी थी तो घर के हर सदस्य को काम करना होता था. बचपन में खेतों में काम करते हुए करमा, ददरिया, सुआ गीत गाया करती थी और नारियल की शर्त लगाती थी. लेकिन हर बार मैं जीत जाया करती थी." तीजनबाई बतातीं कि कैसे घर के दूसरे सदस्यों के साथ वो खजूर या छिंद के पेड़ से पत्ते लेकर आतीं और पूरा परिवार उसकी चटाई और झाड़ू बना कर बेचने जाता था. बचपन में वो अपनी मां के चाचा बृजलाल पारधी को पंडवानी गाते हुए देखा करतीं और छुप कर उन्हें सुनती रहतीं. धीरे-धीरे महाभारत के ये प्रसंग उन्हें याद होने लगे. इस बीच 12 साल की उम्र में उनकी शादी करा दी गई थी. जिससे शादी हुई, उसकी दो शादियां पहले ही हो चुकी थीं. घर में झगड़े होते थे. कुछ ही महीनों के भीतर पति, चौथी महिला को घर ले आया. तीजन बाई अपने माता-पिता के घर लौट आईं. बाद में तीजन बाई ने प्रेम विवाह किया. लेकिन तीन बच्चों के बाद भी जब तीजन बाई का गाना-बजाना जारी रहा तो पति से झगड़े बढ़ने लगे. तीजन बाई के अनुसार, एक बार वे झाड़ू बेचने रायपुर गई थीं. बकौल तीजन बाई, "झाड़ू बिक गए तो फिल्म देखने चली गई. तुलसी-वृंदा का खेला था. उसे देखने के बाद मैंने तय किया कि अब मैं केवल धार्मिक गाने ही गाऊंगी." वो हंसते हुए एक घटना सुनाती थीं कि कैसे एक गांव में वो पंडवानी में भीम का प्रसंग गा रही थीं, तभी उनके पति मंच पर चढ़ आए और उन्हें घूंसा मार दिया. वो मुस्कुराकर कहती थीं, "पहले लगा कि शायद भीम ने ही मारा होगा लेकिन जब गालियां सुनाई दीं तो समझ में आया, अरे, यह तो मेरा पति है." इस घटना के अगले दिन तीजन बाई थोड़ा-सा चावल-दाल और अपने दोनों बच्चों को लेकर घर से निकल पड़ीं और जा पहुंची चंदखुरी गांव के स्कूल में. वहां उन्होंने गांव वालों के सामने पंडवानी गाना शुरू किया. पंडवानी की ख़बर गांव के मालगुज़ार भूषणलाल देशमुख तक पहुंचीं तो उन्होंने दस रुपये का इनाम दिया, राशन भेजा और तय हुआ कि आज रात गांव की चौपाल पर पंडवानी होगी. तंबूरा, ढोलक बजाने वाले और साथ में पंडवानी की कथा में हुंकार भरने वाले रागी उम्मेद सिंह के साथ आधी रात तक पंडवानी का गायन कार्यक्रम चला. तीजन बाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं, इसलिए उम्मेद सिंह उन्हें दिन में पंडवानी के अलग-अलग प्रसंग याद कराते और तीजन बाई उन्हें याद कर, रात को पंडवानी प्रस्तुत करतीं. जब तीजन बाई ने चंदखुरी गांव में तीन दिनों का पंडवानी गाया तो लोग चकित रह गए. असल में उस समय में महिला पंडवानी गायिकाएँ केवल बैठकर गा सकती थीं, जिसे वेदमती शैली कहा जाता था. इसे मूलतः पुरुषों का ही गायन माना जाता था. यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में पंडवानी की पहली महिला कलाकार सुखिया बाई भी जब अपनी प्रस्तुति देती थीं तो वो भी पुरुष वेश में ही मंच पर उतरती थीं. सुखिया बाई के बाद लक्ष्मी बाई ने महिला वेश में पंडवानी गाना शुरू किया. लेकिन ये सभी वेदमति शैली की ही पंडवानी गाती थीं. तीजन बाई ने परंपरा तोड़ी. वो खड़ी होकर कापालिक शैली में पंडवानी गाने लगीं, जहां कलाकार अपनी कल्पना से महाभारत के प्रसंगों को जीवंत करता है. तीजन बाई बताती थीं कि बरसों पंडवानी गाने के बाद, एक बार भोपाल के भारत भवन में जब उनका कार्यक्रम रखा गया, तब उन्हें जाकर पता चला कि वो पंडवानी की कापालिक शैली की गायिका हैं. पंडवानी की अपनी यात्रा को लेकर तीजन बाई बताती थीं, "उम्मेद सिंह जी ने मुझे पंडवानी के प्रसंग याद कराए और फिर दिन में मैं पंडवानी याद करती और रात को गाती." "चंदखुरी में तीन दिन की पंडवानी के बाद पास के गांव में सात दिन की पंडवानी हुई और फिर महाभारत के 18 पर्व की तर्ज़ पर, पड़ोस के गांव में 18 दिन की पंडवानी हुई. फिर पलट कर कभी नहीं देखा." इस बीच जिस पति का घर वो छोड़ आई थीं, उसने अपनी ग़लती मानी और तीजनबाई की फिर से पति के घर वापसी हुई. लेकिन रिश्ता लंबा नहीं चला. पति ने साफ़ कह दिया कि या तो मुझे चुनो या पंडवानी को. तीजन बाई अपने तीन बच्चों को लेकर घर से निकल गईं. उन्होंने पंडवानी को चुनना स्वीकार किया. बाद में तीजनबाई ने अपने संगतकार तुलसीराम देशमुख को जीवनसाथी बनाया. तीजन बाई को पढ़ने-लिखने का अवसर नहीं मिला. लेकिन पंडवानी ने छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी और तीजन बाई को पूरी दुनिया में एक विशिष्ट पहचान दिलाई. उन्होंने धीरे-धीरे अपना नाम लिखना सीखा, फिर हस्ताक्षर करना. तीजन बाई की कला ने उन्हें न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि देश-विदेश में भी पहचान दिलाई. प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें सुना और भोपाल में उनका कार्यक्रम रखा गया. बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निवास से लेकर देश के कई हिस्सों में उनका कार्यक्रम आयोजित किया गया. फिर तय हुआ कि वो हबीब तनवीर के 'नया थियेटर' के साथ जुड़कर काम करेंगी. 'मिट्टी की गाड़ी' नाटक के लिए उन्होंने कुछ दिन रिहर्सल भी किया. तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ी में बताया था, "एक दिन कुछ बात हुई और मैंने तय किया कि मैं केवल पंडवानी ही करूंगी, थियेटर नहीं. मैं लौटकर आई और फिर पंडवानी में रम गई. एक के बाद एक शहरों में मुझे पंडवानी के लिए बुलाया जाने लगा." "लेकिन पेरिस के भारत महोत्सव में जब मैंने भारत का प्रतिनिधित्व किया तो उसके बाद तो मेरी पहचान ही बदल गई. देश भर में मुझे लोग जानने लगे थे. पेरिस से ही एक व्यक्ति ने चिट्ठी भेजी और पता लिखा-तीजन बाई, इंडिया. और मज़ेदार बात ये कि वो चिट्ठी मुझ तक पहुंच भी गई." इन सबके बीच पंडवानी की कथा, दुर्ग, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा लांघती हुई देश और दुनिया में गूंजती रही. उन्होंने फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन जैसे देशों में अपनी पंडवानी की प्रस्तुति दी. 1988 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम 'भारत एक खोज' में भी उन्होंने अपनी प्रस्तुति दी थी. पंडवानी की कपालिक परंपरा की गायिका तीजन बाई और पंडवानी एक-दूसरे के पर्याय बन गए. लेकिन तीजन बाई वही अटारी गांव की निश्छल आदिवासी महिला की तरह बनी रहीं. पहली हवाई यात्रा को लेकर पूछे गए सवाल पर मुस्कुराती और आंखें गोल करती हुई बतातीं- "पेरिस जाना था, तब पहली बार हवाई जहाज़ में चढ़ी. जब हवाई जहाज़ उड़ा तो आसपास बादलों को देख कर एकबारगी ऐसा लगा कि जैसे अब देवलोक की ओर ही प्रस्थान करने वाले हैं. बहुत डरी हुई भी थी." "लेकिन जब पेरिस पहुंची तो जान में जान आई. हां, वहां केवल गोरे-गोरे लोगों को देख कर फिर डर लगा कि पता नहीं ये लोग मेरा गाना सुन-समझ भी पाएंगे या नहीं. लेकिन लोगों ने खूब सुना-देखा और उन्हें खूब मज़ा आया." तीजन बाई को उनकी कला के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया. 1988 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया. इसके अलावा, उन्हें 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2007 में नृत्य शिरोमणि से भी सम्मानित किया गया. 2003 में तीजन बाई को बिलासपुर के गुरुघासीदास विश्वविद्यालय ने डी लिट् से सम्मानित किया. 2017 में उन्हें इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ ने भी डी लिट् से सम्मानित किया. कुछ साल पहले जाने-माने फ़िल्म अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की पत्नी आलिया सिद्दीकी ने उन पर एक बायोपिक बनाने की घोषणा की थी. तीजनबाई को उम्मीद थी कि फ़िल्म जल्दी ही बन जाएगी लेकिन बात बनी नहीं. 2018 में तीजनबाई को दिल का दौरा पड़ा लेकिन इलाज के कुछ ही दिनों के बाद, उन्होंने फिर से पंडवानी शुरू कर दी. देश के अलग-अलग इलाकों में उन्होंने पंडवानी की प्रस्तुतियां दीं. लेकिन 2023 में बेटे शत्रुघ्न की मौत ने उन्हें तोड़ दिया. एक और बेटे कौशल की पहले ही मौत हो चुकी थी. तीन में से दो बेटों की मौत के बाद जून 2023 में उन्हें पक्षाघात का दौरा पड़ा और उनका स्वास्थ्य गिरता गया. लकवाग्रस्त होने के बाद उनकी हालत गंभीर हुई और जैसे समय ने राग बदल दिया. तबियत अचानक बिगड़ी और फिर सुधार नहीं हुआ. वो बिस्तर पर रहने लगीं, बातों से दूर, स्मृतियों से भी. जो आवाज़ कभी समूचे महाभारत को जीवंत कर देती थी, अब मौन हो चुकी थी. घर वाले बताते कि अब वो फिर से बचपन में लौट आई थीं. बच्चों जैसी बातें करती थीं. जैसे जीवन का चक्र पूरा हो गया हो, वही मासूमियत, वही निश्छलता, बस तंबूरा अब निःशब्द पड़ा था. महीनों सरकारी पेंशन बंद रही. फिर मीडिया में ख़बर आई तो पेंशन शुरू हुई. डॉक्टरों की टीम इलाज के लिए भेजी गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 1 नवंबर को, छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव पर जब तीजन बाई का हाल-चाल जानने के लिए फ़ोन किया तो फिर ज़िले के कलेक्टर घर पहुंचे और अगले दिन तीजन बाई को रायपुर के एम्स में भर्ती किया गया. कुछ दिन इलाज के बाद वो वापस गांव लौट गईं. लेकिन हालत में बहुत सुधार नहीं हुआ और अंततः इसी बीमारी के साथ उन्होंने शनिवार देर रात को इस दुनिया को अलविदा कह दिया. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi